Saturday, 18 April 2026

mdu

APRIL 19
A SPECIAL DAY 
MAHARSHI DAYANAND UNIVERSITY ROHTAK'S FOUNDATION DAY 
Heartiest Greetings to all the faculty members, non-teaching employees, current students, alumni, retired teachers and non-teaching employees of MDU Rohtak on the occasion of FOUNDATION DAY.
MDU came into existence on April 19,1976.
Remembering all the faculty members, non-teaching staff, University functionaries( COEs, Registrars, Deans, Vice Chancellors) who worked steadfastly for growth & development of this varsity on this special day.
Acknowledging the efforts of all stakeholders in the progress journey of this varsity.
Proud of our Alumni who have kept and are keeping the MDU Flag fly high!
May our University rise to new heights of excellence in years to come!
#M.D.UNIVERSITY ROHTAK
#MDU MOVES AHEAD

Sunday, 29 March 2026

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020

लेख

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: उदय एवं वर्तमान
प्रभु सिंह

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 हम यहां तक कैसे पहुंचे ?

1980 के दशक में समाजशास्त्र अर्थशास्त्र, साम्राज्यवाद, अलग-अलग संघर्षों को कक्षा-कक्ष में ठीक प्रकार हो पढ़ाया जाता था। 1990 तक आते-आते बदलने लगी। मंडल आंदोलन, बाबरी विध्वंस, सोवियत संघ का पतन, उदारीकरण की नीतियों की शुरुआत, निजी पूंजीवाद को बढ़ावा, सार्वजनिक ढांचे को घटाना शुरू हो गया। बड़ी-बडी मिलों का खात्मा होने लगा। मिलों में स्थायी रोजगार की बजाय ठेकाप्रथा आने लगी। बड़ी भूमिका मध्य वर्ग ने भी निभाई। वेतन में अच्छी बढोतरी, घर-गाड़ी, विलासिता के साधन बढ़े। यह मध्य वर्ग का स्वर्णकाल साबित हुआ। पहचान की राजनीति का उद्भव हुआ। जात और धर्म भी आ गए। यह भी सही है, वह भी सही है, सत्य नाम की कोई चीज नहीं है। किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए तर्क, मानदंड, प्रक्रिया का कोई स्थान नहीं रहा। इनके बिना वस्तुनिष्ठ सत्य, सार्वभौमिक सत्य, वैज्ञानिक समझ असंभव है। राजनीति खतरनाक स्तर पर उभरकर आती है। खतरनाक, व्यक्ति निष्ठ विचार पनपने लगे। इन सभी से फासीवादी ताकतों को आगे बढने का मौका मिला।

आपातकाल के बाद जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो जनसंघ भी एक घटक के रूप में सरकार का हिस्सा बना। उन्होंने पहला निशाना इतिहास को बनाया। आर.ए. शर्मा तथा रोमिला थापर की पुस्तकें जलाई गई। उनका मत था कि जब तक इतिहास नहीं बदलेंगे हिन्दू राष्ट्र नहीं ला पाएंगे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में एन.सी.ई.आर.टी. की पुस्तकों को निशाना बनाया गया, लेकिन ज्यादा कुछ नहीं कर पाए। हिन्दुस्तान को अपनी परंपरा पर गर्व, उपनिवेशवाद की गलतियों को खत्म करना, सावरकर से लेकर नरेन्द्र मोदी तक इनकी समझ ब्रिटिश उपनिवेशवाद की समझ है। आडवाणी जी की सोमनाथ से यात्रा आरंभ कर बाबरी मस्जिद पर खत्म करना, मोदी जी का सोमनाथ जाना एक सोची समझी है रणनीति के ही परिणाम है। नफरती दीवारें बड़ी होती जा रही हैं। हिंदू राष्ट्रवाद के समर्थक नारा लगाते हैं- बंटेंगे तो कटेंगे, एक हैं तो सेफ हैं। लव जेहाद, गाय के नाम पर लिंचिंग, समाज में भय का माहौल, घरों को बुलडोजरों से जमींदोज करना जैसे कार्यों से सामाजिक एकता व गंगा जमुनी तहजीब को तार-तार कर रहे हैं। समता दिवस के अवसर पर इतिहासकार इरफान हबीब के दिल्ली विश्वविद्यालय में भाषण के दौरान दक्षिण पंथी विचारधारा के छात्रों ने उन पर पानी फेंका जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा उदारमत को समाज से समाप्त करने की कोशिश के ही परिणामस्वरूप हैं।

      शिक्षा में एकीकृत सांस्कृतिक संक्रमण ज्ञान प्रणाली या व्यापक रूप से "भारतीय ज्ञान प्रणाली की मुख्य धारा की शिक्षा के साथ एकीकरण है।" राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के सन्दर्भ में यह एक ऐसा ढांचा है जो भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, पारंपारिक ज्ञान, दर्शन और कौशलों को आधुनिक शिक्षा के साथ मिलाकर पढ़ाता है। यह भारतीय प्राचीन परंपराओं को जैसे गुरु-शिष्य, योग, आयुर्वेद आधारित ज्ञान, वेदों से लेकर आधुनिक विज्ञान तक सभी विषयों को एक साथ जोड़कर पढ़ना है।

शिक्षा का "वस्तुकरण" (Commodification ):

नीति के प्रावधानों ने शिक्षा को एक सार्वजनिक सेवा (public good) के बजाय एक बाजार-उन्मुख वस्तु (market-driven commodity) में बदल दिया है। अब गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच काफी हद तक परिवार की आय पर निर्भर हो गई है।

हाशिए के समुदायों पर असरः यह बढ़ता खर्च सबसे ज्यादा आर्थिक रूप से कमजोर और हाशिए के समुदायों (SC, ST, OBC, अल्पसंख्यक) को प्रभावित करता है। आरक्षण जैसी नीतियां भले ही कागज पर मौजूद हों, लेकिन शिक्षा के बाजारीकरण के कारण ये अपना व्यावहारिक अर्थ खोती जा रही हैं। आंकड़े बताते हैं कि निजी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों पर प्रति वर्ष औसतन र 25,000 खर्च होता है, जबकि सरकारी स्कूलों में यह खर्च मात्र ₹2,863 है। यानि निजी स्कूली शिक्षा सरकारी स्कूलों की तुलना में लगभग 9 गुना महंगी है।
    NEP 2020 में डिजिटल और ऑनलाइन शिक्षा पर बहुत जोर दिया गया है, लेकिन यह सुनिश्चित नहीं किया गया कि सभी वर्गों के छात्रों की इस तक पहुंच हो। देश के केवल 32.4% स्कूलों के पास कार्यात्मक कंप्यूटर हैं और सिर्फ 24.4% स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम की सुविधा है। यह डिजिटल बंटवारा ग्रामीण और सरकारी स्कूलों के छात्रों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है, जिससे शैक्षणिक असमानता और बढ़ जाती है। 
व्यावसायिक शिक्षा : अवसर या मजबूरी? नीति में सामान्य शिक्षा के साथ व्यावसायिक प्रशिक्षण को जोड़ने पर जोर दिया गया है, जिसके गंभीर सामाजिक निहितार्थ हो सकते हैं। व्यावसायिक शिक्षा पर यह जोर सामाजिक बशर्ते इन रूप से पिछड़े वर्गों के छात्रों के लिए एक मजबूरी बन सकता है। ऐतिहासिक रूप से, कुछ जातियां कुशल श्रम (जैसे बढ़ईगीरी, लोहारगिरी) से जुड़ी रही हैं। नीति में इस प्रकार के पाठ्यक्रमों को बढ़ावा देकर उन्हें उन्हीं पारंपरिक व्यत्रसायों तक सीमित रखने की कोशिश हो सकती है, न कि उन्हें आगे बढ़ने के नए अवसर प्रदान करने की। यह नीति भारत में पहले से मौजूद सस्ते और अनौपचारिक श्रम बाजार को और मजबूत कर सकती है। "कुशल श्रम" पर जोर देकर यह शिक्षा को केवल रोजगार केंद्रित बनाने की कोशिश करती है, न कि समग्र और आलोचनात्मक चिंतन वाले नागरिक तैयार करने की।

सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) का बढ़ता दायरे को बढ़ावा दिया गया है। पंजाब में अम्परसैंड ग्रुप (Ampersand Group) द्वारा सरकारी स्कूलों के प्रबंधन और राजस्थान में डेवलपमेंट इम्पैक्ट बॉन्ड (DIB) जैसे प्रयोग इस बात के उदाहरण हैं कि कैसे निजी क्षेत्र धीरे-धीरे सार्वजनिक शिक्षा के संचालन में अपनी भूमिका बढ़ा रहा है। NEP 2020 के निर्माण और कार्यान्वयन में विश्व बैंक (World Bank) जैसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। STARS (Strengthening Teaching-Learning
and Results for States) कार्यक्रम के तहत विश्व बैंक स्कूली शिक्षा की संरचना, पाठ्यक्रम और मूल्यांकन प्रणाली को प्रभावित कर रहा है। चिंतकों का मानना है कि यह एक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था है, जिसका उद्देश्य शैक्षणिक सुधार नहीं, बल्कि बाजार का विस्तार करना है। सरकार का "व्यावसायीकरण रोकना" महज एक दावा है, जबकि नीति की संरचना ही शिक्षा को बाजार के हवाले करने वाली है। इसे तीन प्रमुख रूपों में देखा जा सकता है:

1. ग्रेडेड ऑटोनॉमी (Graded Autonomy) स्वायत्तता के नाम पर वित्तीय बोझ का स्थानांतरण: नीति में उच्च शिक्षण संस्थानों (HEIs) को "ग्रेडेड ऑटोनॉमी" में देने का प्रावधान है। इसका मतलब है कि संस्थान बिना UGC की मंजूरी के नए कोर्स शुरू कर सकते हैं, फीस तय कर सकते हैं, और विदेशी फैकल्टी रख सकते हैं-बशर्तें इन सबका खर्च सरकारी फंडिंग से न होकर ट्यूशन फीस से उठाया जाए। यह प्रावधान सरकार को अपनी वित्तीय जिम्मेदारी से मुक्त करता है। यह "सेल्फ-फाइनेंसिंग कोर्स" के जरिए सार्वजनिक शिक्षा के निजीकरण का एक चालाकीपूर्ण तरीका है। विश्वविद्यालयों को फीस बढ़ाने या कॉरपोरेट से साझेदारी करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जिससे शिक्षा महंगी हो जाएगी और मुनाफा कमाने का उद्देश्य हावी हो जाएगा।

2. संस्थागत समेकन (Institutional Consolidation) - छोटे कॉलेजों का विलय या बंद होना: NEP 2020 में प्रति उच्च शिक्षण संस्थान न्यूनतम 3,000 छात्रों के नामांकन का लक्ष्य रखा गया है। भारत में 5% से भी कम संस्थानों में 3,000+ छात्र हैं। अधिकांश कॉलेज छोटे हैं, खासकर ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में स्थित कॉलेज, जिन्हें समानता (equity) को बढ़ावा देने के लिए ही - खोला गया था। 50,000 संस्थानों को घटाकर 15,000 - करने और 3,000 से कम छात्रों वाले कॉलेजों को बंद या विलय करने की योजना से क्षेत्रीय असमानताएं बढ़ेंगी। छोटे सरकारी कॉलेज बंद होंगे और छात्रों का रुझान निजी संस्थानों की ओर बढ़ेगा। सरकारी विद्यालयों में ड्राप आउट बढ रहा है। 3. विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए द्वार खोलने की नीति के अंतर्गत पहली बार विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपने कैंपस खोलने की अनुमति देती है। ये कैंपस उच्च फीस लेंगे, चुनिंदा प्रवेश पर आधारित होंगे और अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाएंगे। शोधकर्ताओं का मानना है कि जब "गुणवत्तापूर्ण शिक्षा" का मॉडल यही महंगे और बाजार अनुकूल संस्थान बन जाएंगे, तो समानता और समावेशन बुरी तरह प्रभावित होगा।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के निर्माण और कार्यान्वयन में फासीवादी ताकतों (विशेष रूप से संघ परिवार से जुड़े समूह) की भूमिका को कई अध्ययनों और रिपोर्टों में रेखांकित किया गया है। यह भूमिका प्रत्यक्ष नीति निर्माण से लेकर अप्रत्यक्ष सांस्कृतिक प्रभाव स्थापित करने तक फैली हुई है। शिक्षा पर हमले के केंद्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का दीर्घकालिक लक्ष्य है- हिंदू राष्ट्र की स्थापना। RSS के लिए राजनीतिक नियंत्रण से अधिक महत्वपूर्ण है सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करना। इसे प्राप्त करने के लिए शिक्षा को सबसे बड़ा माध्यम माना गया है। NEP 2020 को इसी दृष्टि को जमीन पर उतारने का एक साधन बनाया गया है। नीति में बार-बार "भारतीय ज्ञान प्रणाली", "भारतीय मूल्यों" और "भारतीय मिट्टी" से जुड़ने पर जोर दिया गया है। इन शब्दों का इस्तेमाल एक संकीर्ण, हिंदुत्व-केंद्रित पहचान को स्थापित करने के लिए किया जा रहा है, न कि भारत की बहुलतावादी संस्कृति को दर्शाने के लिए। NEP 2020 की आलोचना मुख्यतः तीन आयामों पर केंद्रित है, जिन्हें तीन 'सी' (Commercialization, Centralization and Communalization) का नाम दिया गया है।

1. व्यावसायीकरण (Commercialization)

नव-उदारवादी साझेदारी: नीति शिक्षा को लाभ का क्षेत्र बनाने पर बल देती है। इसमें निजी भागीदारी को बढ़ावा देना और सार्वजनिक शिक्षा के बजट में कटौती को वैध ठहराना शामिल है। यह "नव-उदारवादी-नव-फासीवादी गठजोड़" का परिणाम है, जहां अंतरराष्ट्रीय पूंजी के हित और हिंदुत्ववादी ताकतों का सामाजिक एजेंडा एक साथ काम कर रहे हैं। 2. केंद्रीकरण (Centralization )सत्ता का संकेंद्रण :UGC, AICTE जैसे मौजूदा नियामक निकायों को समाप्त कर एक छत्र संगठन के तहत लाने की प्रक्रिया को "सत्ता का पूर्ण केंद्रीकरण" बताया गया है, जिसे फासीवाद की मूलभूत विशेषता माना जाता है। राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) और राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (NRF) जैसे निकायों के गठन को शैक्षणिक स्वतंत्रता और लचीलेपन को समाप्त करने और राजनीतिक दुरुपयोग के उपकरण के रूप में देखा जा रहा है। यह केंद्रीकरण संघीय ढांचे पर भी हमला है। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों को केंद्रीय योजनाओं (जैसे PM-SHRI स्कूल) के लिए सहमत होने हेतु वित्तीय दबाव डाला जा रहा है, जिससे राज्य सरकारों की शिक्षा नीति बनाने की शक्ति कम हो रही है।
3. सांप्रदायिकरण (Communalization)

पाठ्यक्रम का हिंदुत्वीकरण :- यह सबसे स्पष्ट हमला है। पाठ्यक्रम में विज्ञान और इतिहास को विकृत करने की कोशिश की जा रही है। NCERT की पाठ्यपुस्तकों से इतिहास के बड़े हिस्सों को हटाया जा रहा है, विशेष रूप से मुस्लिम शासनकाल और भारत की बहुलतावादी विरासत से जुड़े अध्याय । प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर के अनुसार, ऐसा करके "अधिकार में बैठे लोग जो र पढ़ाते हैं, उसी से संतुष्ट रहने वाले नागरिक तैयार करना है, बिना किसी सवाल के"। कक्षा 9 और 10 की पाठ्यपुस्तकों से डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को हटाना इस बात का उदाहरण है कि कैसे धार्मिक रूढ़िवादिता को वैज्ञानिक तथ्यों पर हावी किया जा रहा है। इसे हिंदुत्ववादी ताकतों द्वारा विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर हमले के रूप में देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री जी द्वारा प्लास्टिक सर्जरी का प्रमाण गणेश के माध्यम से डॉक्टर की जनसभा में देना और डॉक्टर द्वारा तालियां बजाना, मोर का आंसुओं से प्रजनन, पंचगव्य-गोबर, मूत्र, दूध, दही और घी सभी रोगों की दवा और इन्हीं के अनुसंधान पर बल देना इन्हीं हमलों के परिणामस्वरूप हैं। सूडो साइंस को बढ़ावा, सरस्वती प्रोजेक्ट, मंत्रोच्चारण से मरीज में क्या सुधार आया, गाय का गोबर परमाणु विकिरणों को रोकने में सहायक पर अनुसंधान पर बल दिया जा रहा है। बाबाओं का  बोलबाला है जो जनता को अंधविश्वास में डालकर उनका आर्थिक, शारीरिक व मानसिक शोषण कर रहे हैं।

संघीय ढांचे को कमजोर करनाः
   “विकसित भारत शिक्षा अधिक्षण बिल" जैसे प्रस्तावों के माध्यम से उच्च शिक्षा के लिए एकल, केंद्रीयकृत नियामक संस्था बनाने की कोशिश की जा रही है। यह शिक्षा के समवर्ती सूची में होने के बावजूद राज्यों की भूमिका को सीमित करता है और संघीय ढांचे को कमजोर करता है। इस बिल में अनुदान वितरण की जिम्मेदारी सीधे शिक्षा मंत्रालय को देने का प्रस्ताव है, जिससे फंडिंग प्रक्रिया मनमानी और राजनीतिक प्रभाव के अधीन हो जाएगी। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) जैसी संस्थाओं में संघ से जुड़े लोगों को नियुक्त करके इतिहास के पुनर्लेखन की प्रक्रिया को तेज किया गया है। इन नियुक्तियों का उद्देश्य महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथों की ऐतिहासिकता सिद्ध करना और जाति प्रथा का महिमामंडन करना है। शिक्षा पर हमले का सबसे हिंसक और दृश्यमान रूप उन लोगों पर हमला है जो सवाल उठाते हैं या असहमत हैं।

कैंपस में हमले और दमनः जेएनयू, जामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय और एफटीआईआई सहित देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में फासीवादी हमले देखे गए हैं।

छात्रों पर हमले, उन्हें निलंबित करना और उनके खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज करना आम बात हो गई है। छात्र राजनीति पर हमलाः जेएनयू और दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय (SAU) में छात्र विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, जिससे छात्रों की अभिव्यक्ति और सक्रियता कमजोर हुई है। छात्रसंघ चुनावों को प्रभावित करने और उन्हें भंग करने की कोशिशें भी लगातार हो रही हैं। स्कॉलर्स एट रिस्क (SAR) की रिपोर्ट के अनुसार, धमकी और खतरे के कारण कई शिक्षाविदों ने अपना महत्वपूर्ण कार्य वापस ले लिया है या इस्तीफा दे दिया है। इससे शिक्षा के क्षेत्र में आत्म-सेंसरशिप को बढ़ावा मिला है। इन हमलों का नतीजा संख्याओं में भी साफ देखा जा सकता है। स्कॉलर्स एट रिस्क (SAR) की "फ्री टू थिंक 2024"- रिपोर्ट के अनुसारः शैक्षणिक स्वतंत्रता सूचकांक वर्ष 2013 और 2023 के बीच भारत का स्कोर 0.6 से - गिरकर 0.2 हो गया है। 0.2 के इस स्कोर के साथ भारत अब "पूर्णतः प्रतिबंधित" श्रेणी में आ गया है, जो 1940 के दशक के मध्य के बाद से सबसे कम स्कोर है।

आधुनिक फासीवादी ताकतें खुले तौर पर - तानाशाही की बात नहीं करर्ती, बल्कि "लोकतंत्र" और "मुक्ति" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके अपने अभियान को सही ठहराती हैं। सूचना पर नियंत्रण और झूठ का सहारा भय और अराजकता पैदा करके सत्तावादी समाधान थोपना, सत्य के प्रति अविश्वास पैदा करना अपराध दर गिरने के बावजूद शहरों को "हिंसक गिरोहों" से भरा बताना, आपदा में राष्ट्रवाद फैलाना, भाषा और राजनीतिक बहस का दुरुपयोग "लोकतंत्र" और "मुक्ति" जैसे शब्दों को हथियाना, विरोधियों व मुसलमानों को "आतंकवादी" या "देशद्रोही" करार देना आप्रवासियों को "देश पर आक्रमण" करने वाला बताना, एलजीबीटीक्यू समुदाय को "बच्चों के लिए खतरा" करार देकर उनके प्रति हिंसा को बढ़ावा दिया जाता है।

फासीवादी ताकतों के लिए विश्वविद्यालय और स्कूल सबसे बड़े दुश्मन हैं, क्योंकि ये संस्थान आलोचनात्मक चिंतन और बहुलतावादी दृष्टिकोण को बढ़ावा देते हैं। ये ताकतें शिक्षकों और प्रोफेसरों को "मार्क्सवादी" और "देशद्रोही" करार देकर उनकी विश्वसनीयता खत्म करने की कोशिश करती हैं। जे.डी. वेंस जैसे नेताओं ने खुले तौर पर कहा कि "प्रोफेसर दुश्मन हैं"।

इन हमलों का मुकाबला करने के लिए यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ झूठ का मुकाबला करने से कहीं आगे की लड़ाई है। यह सुनिश्चित करना है कि हम सत्य की अवधारणा में विश्वास न खोएं। मजबूत लोकतांत्रिक संस्थानों की रक्षा करना, शिक्षा को स्वतंत्र रखना और समाज में फैलाई जा रही नफरत और डर की राजनीति को लगातार उजागर करना इस वैश्विक चुनौती से निपटने के प्रमुख उपाय हैं।

'जुल्म के साये लब खोलेगा कौन और अब हम भी चुप रहे तो बोलेगा कौन ?'