Wednesday, 12 August 2026

Educaruon

: हरियाणा में पिछले कुछ वर्षों में छात्र संख्या कम होने के कारण सरकार द्वारा कुछ सरकारी स्कूलों को बंद या मर्ज भी किया गया है (जैसे पूर्व में संसद में दी गई जानकारी के अनुसार लगभग 292 स्कूल)।
: हरियाणा के सरकारी स्कूलों की स्थिति बेहद चिंताजनक है।
प्रदेश के 37 स्कूलों में एक भी छात्र नहीं है और 274 स्कूलों में 10 से कम बच्चे हैं।

BJP सरकार न तो शिक्षकों की भर्ती कर रही है, न ही सरकारी स्कूलों की व्यवस्था सुधार रही है।
इसी कारण से बच्चे मजबूर होकर स्कूल छोड़ रहे हैं। जब स्कूलों में शिक्षक और सुविधाएं ही नहीं होंगी, तो कौन रहेगा? फिर सरकार कहेगी कि स्कूल खाली हैं और उन्हें बंद कर देगी।

इसका सबसे बड़ा असर गरीबों और ग्रामीण तबके के बच्चों पर पड़ेगा, जिनकी शिक्षा का एकमात्र सहारा ये सरकारी स्कूल हैं।

सरकार को चाहिए कि वह खाली पड़े 15,000 से अधिक शिक्षकों के पद तुरंत भरे, स्कूलों का इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधारे और बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करे।

जब तक सरकारी स्कूलों का स्तर नहीं सुधरेगा, बच्चे नहीं आएंगे। और जब तक शिक्षा नहीं मिलेगी, समाज आगे नहीं बढ़ेगा।
: मैडम सैलजा
: #उच्चशिक्षा 
(एआइएसएचई) का शिक्षा मंत्रालय का डॉटा यह दिखाता है कि जो लोग भारत में विश्वविद्यालयों की स्थापना कर रहे हैं, उनमें एक बदलाव आया है। वर्ष 2013-14 से वर्ष 2023-24 तक का एआइएसएचई का डाटा यह दिखाता है कि भारत में निजी प्रबंधन वाले विश्वविद्यालयों की संख्या 219 से बढ़कर 546 हो गयी है। यह करीब 149 फीसद की उछाल है। जबकि इसी अवधि में सरकारी विश्वविद्यालयों की संख्या 504 से बढ़कर 733 हो गयी है, जो कि 45 फीसद से थोड़ी ही ज्यादा की बढ़ोतरी को दिखाता है।
: #हमारीशिक्षा 
हरियाणा में पिछले सात वर्षों के दौरान विद्यार्थियों की संख्या कम होने के कारण लगभग 400 सरकारी स्कूलों को पास के अन्य स्कूलों में मर्ज (विलय) किया गया है, जिसमें अकेले 2022 में 180 राजकीय प्राइमरी पाठशालाएं शामिल थीं।
: NEET 2026 "पेपर लूट" से छात्रों के साथ अन्याय और उन्हें परेशानी: AIPSN का बयान
हम अपने युवाओं के साथ हो रहे एक भयानक मज़ाक को देख रहे हैं, जो उच्च शिक्षा कार्यक्रमों में दाखिले के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। हाल ही में, बड़े पैमाने पर 'पेपर लीक' की शिकायतों के कारण NEET प्रवेश परीक्षाएँ रद्द कर दी गई हैं। CBI की चल रही जाँच से एक संगठित नेटवर्क का खतरनाक सच सामने आया है, जो कोचिंग, "गेस पेपर" और "मॉक टेस्ट" की आड़ में प्रश्न-पत्र बेचता है। हैरानी की बात है कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के डायरेक्टर लगातार किसी भी 'पेपर लीक' से इनकार कर रहे हैं; हम भी इस बात से सहमत हो सकते हैं कि यह कोई अचानक हुआ लीक नहीं है, बल्कि भारी पैसे के दम पर की गई एक सुनियोजित 'पेपर लूट' है।

2024 और फिर 2026 में, NEET UG परीक्षा (मेडिकल अंडरग्रेजुएट एडमिशन) में पेपर लीक होने की खबरें आईं, जिससे 22.79 लाख छात्रों का भविष्य और ज़्यादा अनिश्चितता और चिंता में पड़ गया। जांच से पता चला है कि महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और कश्मीर में कई राज्यों में फैले संगठित नेटवर्क काम कर रहे थे, जिनमें पेपर सेट करने वाले, कोचिंग सेंटर, कूरियर सर्विस, 'सॉल्वर गैंग' और अन्य लोग शामिल थे। NEET परीक्षा रद्द होने का मामला उन कई परीक्षाओं में से एक है जिनमें गड़बड़ी और पेपर लीक की घटनाएं हुई हैं; जैसे SSC CGL परीक्षा (2017-18), जिसने कंप्यूटर-आधारित परीक्षाओं की कमज़ोरियों को उजागर किया; CBSE (2018), जिसमें परीक्षा से पहले 10वीं कक्षा के गणित और अर्थशास्त्र के पेपर लीक हो गए थे; रेलवे भर्ती परीक्षाएं (2009, 2013, 2014, 2024, 2025); और UGC-NET परीक्षा का रद्द होना (2024)।

2017 में अपनी स्थापना के बाद से, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) NEET UG और UGC-NET जैसी अहम परीक्षाओं की शुचिता और निष्पक्षता बनाए रखने में नाकाम रही है। बार-बार हो रहे ये घोटाले एक ऐसे संगठित नेटवर्क की ओर इशारा करते हैं जिसमें पेपर सेट करने वाले, भ्रष्ट अधिकारी, कोचिंग सेंटर, प्रिंटिंग प्रेस और साइबर नेटवर्क शामिल हैं, जो अक्सर बिना किसी डर और राजनीतिक संरक्षण के काम करते हैं। ऐसी भ्रष्ट गतिविधियों के गंभीर परिणाम होते हैं, जैसे सरकारी संस्थाओं पर से भरोसा उठना, झूठे वादों के कारण परिवारों का भारी कर्ज में डूबना, छात्रों में मानसिक तनाव और निराशा का बढ़ना, भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता कम होना, और मेडिकल व टीचिंग जैसे संवेदनशील पेशों में फर्जी दस्तावेजों के साथ भ्रष्ट लोगों का आना, जिससे लोगों की जान को भी खतरा हो सकता है।

साल 2024 में कई गड़बड़ियाँ सामने आईं; 1500 से ज़्यादा परीक्षार्थियों को ग्रेस मार्क्स दिए गए, जबकि 67 उम्मीदवारों ने पूरे मार्क्स के साथ पहली रैंक हासिल की। ​​साल 2026 में NTA बुरी तरह नाकाम रहा है और CBI की चल रही जाँच से NEET UG प्रवेश परीक्षा में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियाँ सामने आ रही हैं, जो शायद समस्या का सिर्फ़ एक छोटा सा हिस्सा हैं। रिपोर्टों से पता चलता है कि लीक हुए पेपर बेधड़क 15 से 30 लाख रुपये या उससे भी ज़्यादा कीमत पर बेचे गए, और यहाँ तक कि "गेस पेपर" के लिए कई महीने पहले ही "बुकिंग" कर ली गई थी... 2024 में लागू किए गए 'पब्लिक एग्ज़ामिनेशन्स (प्रिवेंशन ऑफ़ अनफेयर मीन्स) एक्ट' के लागू न होने और उसके प्रति कोई डर न होने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

NTA, NEET UG, JEE Main, UGC-NET, CUET-UG और CUET-PG, CMAT, GPAT, NCET और SWAYAM जैसी बड़ी परीक्षाएं आयोजित करता है और यह देश के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है। NTA पर हर साल 80 लाख से ज़्यादा उम्मीदवारों (लगभग 24 लाख NEET-UG के लिए, 12-14 लाख JEE Main के लिए, 30 लाख से ज़्यादा CUET के लिए, और कई लाख UGC-NET व अन्य परीक्षाओं के लिए) के भविष्य की ज़िम्मेदारी होती है। इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी एक ऐसी एजेंसी को सौंपी गई है जो संसद के किसी कानून से बनी सरकारी संस्था नहीं है, बल्कि 'सोसाइटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860' के तहत रजिस्टर्ड एक सोसाइटी है।

भले ही यह एडमिशन फ़ीस के ज़रिए भारी फ़ंड इकट्ठा करता है, लेकिन यह संसद या CAG ऑडिट के प्रति जवाबदेह नहीं है। इसके अलावा, NTA जिन बड़े कामों को करता है, उनके लिए यह एकेडमिक रूप से तैयार नहीं है और इसकी बार-बार की नाकामियों का हमारे युवाओं और समाज के बड़े हिस्से पर गंभीर असर पड़ रहा है। असल में, NTA का ज़्यादातर कामकाज आउटसोर्स की गई एजेंसियों, कॉन्ट्रैक्ट पर रखे गए कर्मचारियों, डेप्युटेशन पर आए अधिकारियों, अस्थायी परीक्षा स्टाफ़ और टेक्नोलॉजी पार्टनर पर निर्भर करता है।
AIPSN की चिंताएँ और विचार
शिक्षा के संघीय स्वरूप और हमारे देश की विविधता को देखते हुए, एडमिशन प्रोसेस और छात्रों को सीट अलॉट करने में राज्य सरकारों की भी भूमिका होनी चाहिए। AIPSN, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी और NEET को खत्म करने की मांग करता है।

AIPSN याद दिलाना चाहता है कि मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया (MCI) ने 2010 में NEET UG शुरू करने की घोषणा की थी, जो 2012 से लागू होने वाला था और इसने उस समय चल रहे AIPMT (ऑल इंडिया प्री-मेडिकल टेस्ट) और अलग-अलग राज्यों की परीक्षाओं की जगह लेनी थी। इस घोषणा के बाद, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु समेत कई राज्यों ने इस प्रस्तावित बदलाव का कड़ा विरोध किया। उन्होंने MCI के प्रस्तावित सिलेबस और अपने राज्यों के सिलेबस में बहुत ज़्यादा अंतर होने और भारत जैसे अलग-अलग संस्कृतियों वाले समाज में एक सेंट्रलाइज़्ड एंट्रेंस एग्ज़ाम कराने के अव्यावहारिक होने का हवाला दिया। नतीजतन, CBSE और MCI ने NEET को एक साल के लिए टाल दिया।

इसके अलावा, 18 जुलाई 2013 को भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सभी मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में एडमिशन के लिए 'नेशनल एलिजिबिलिटी-कम-एंट्रेंस टेस्ट' (NEET) को रद्द कर दिया था (मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया बनाम क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज मामले में)। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया एक संयुक्त परीक्षा आयोजित नहीं कर सकती। हालांकि, बाद में 11 अप्रैल 2016 को पांच जजों की संविधान पीठ ने इस फैसले को वापस ले लिया और NEET को फिर से लागू कर दिया। अब सुप्रीम कोर्ट को पेपर लीक की बार-बार हो रही घटनाओं और इसमें शामिल भ्रष्ट गठजोड़ की न्यायिक जांच का आदेश देने के लिए आगे आना चाहिए। इस बीच, NEET की दोबारा परीक्षा का बोझ डालने के बजाय, इस साल मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन स्कूल के मार्क्स के आधार पर होने चाहिए।

NEET की परीक्षा का सिलेबस ऐसा है कि छात्र परोक्ष रूप से कोचिंग सेंटर जॉइन करने के लिए मजबूर हो जाते हैं, जहाँ उन्हें भारी-भरकम फीस देनी पड़ती है; यह फीस खुद एंट्रेंस एग्जाम की एप्लीकेशन फीस से कई गुना ज़्यादा होती है। आजकल, कॉम्पिटिशन में बने रहने के लिए छात्र छठी क्लास से ही कोचिंग सेंटरों के ज़रिए NEET की तैयारी शुरू कर देते हैं। हालाँकि, गरीब और वंचित छात्रों के लिए सिर्फ़ NEET में शामिल होने के लिए कोचिंग पर लाखों रुपये खर्च करना मुमकिन नहीं है। इस तरह, मौजूदा सिस्टम असल में काबिल छात्रों को मेडिकल एजुकेशन से दूर कर देता है और साथ ही प्राइवेट कोचिंग सेंटरों का बाज़ार भी बढ़ाता है। यही एक मुख्य कारण है कि प्राइवेट कोचिंग सेंटर कॉम्पिटिटिव मार्केट का फ़ायदा उठाने के लिए पेपर लीक और भ्रष्टाचार के मामलों में शामिल हो जाते हैं।

पहले NEET परीक्षा CBSE आयोजित करती थी, लेकिन अब इसे NTA आयोजित करता है, जो 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020' के तहत काम करता है। हालाँकि, NTA न तो पूरी तरह से सरकारी संस्था है और न ही ऐसी महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाएँ आयोजित करने में सक्षम कोई एकेडमिक संस्था; ये परीक्षाएँ मेडिकल साइंस में उच्च शिक्षा का रास्ता खोलती हैं। इसके अलावा, NTA के पास इतने बड़े पैमाने पर परीक्षाएँ आयोजित करने के लिए ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर और क्षमता की कमी है। कई मायनों में, NTA सिर्फ़ एक नौकरी भर्ती एजेंसी की तरह काम करता है। NTA की इसी प्रकृति के कारण, कई लोगों ने अनुमान लगाया था कि यह विफल हो जाएगा और इससे बड़े घोटाले होंगे। यह अनुमान 2024 में NEET UG और UGC-NET से जुड़े बड़े विवादों के साथ सच साबित हुआ और 2026 में भी यही स्थिति और भी बड़े पैमाने पर दोहराई गई।

कई अख़बारों की जांच और जांच रिपोर्टों में NEET पेपर लीक के बार-बार होने वाले विवादों में कोचिंग सेंटरों, "गेस पेपर" रैकेट और संगठित परीक्षा नेटवर्क (जिसमें परीक्षा से जुड़े अंदरूनी लोग और NTA से जुड़े व्यक्ति शामिल हैं) की मिलीभगत का आरोप लगाया गया है। खबरों के अनुसार, राजस्थान के जांचकर्ताओं ने हाथ से लिखा एक "गेस पेपर" बरामद किया, जिसमें लगभग 150 सवाल थे जो असली NEET परीक्षा के पेपर से मेल खाते थे (720 में से 600 अंकों के बराबर)। इससे कोचिंग हब से जुड़े लीक नेटवर्क का शक पैदा हुआ (द टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 12 मई, 2026 और इंडिया टुडे, 11 मई, 2026)। रिपोर्टों में यह भी आरोप लगाया गया कि परीक्षा से पहले राजस्थान के कोचिंग हब, सीकर में कोचिंग सेंटरों, काउंसलरों, हॉस्टल संचालकों और WhatsApp ग्रुप्स के ज़रिए लीक हुआ NEET का मटीरियल फैलाया गया था (हिंदुस्तान टाइम्स, 14 मई, 2026)।

मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पर हो रही चर्चाओं में कुछ आरोपियों के राजनीतिक संबंधों पर भी सवाल उठाए गए हैं। इनमें पुणे के मॉडर्न कॉलेज की बायोलॉजी टीचर मनीषा गुरुनाथ मंधारे भी शामिल हैं, जिन्हें केंद्रीय शिक्षा मंत्री के साथ तस्वीरों में देखा गया था (द इकोनॉमिक टाइम्स, 16 मई, 2026)।
काबिल छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ तुरंत बंद होना चाहिए। इतने बड़े स्तर की कॉम्पिटिटिव एंट्रेंस परीक्षाएँ आयोजित करना, फिर पेपर लीक और भ्रष्टाचार की खबरों के कारण उन्हें रद्द करना, और उसके बाद लगभग 23-24 लाख छात्रों के लिए दोबारा परीक्षाएँ आयोजित करना न केवल छात्रों के लिए, बल्कि देश के संसाधनों के लिए भी बहुत बड़ा बोझ है।

इसलिए, ऑल इंडिया पीपल्स साइंस नेटवर्क (AIPSN) ज़ोरदार मांग करता है कि:
NTA को खत्म किया जाए और इसकी ज़िम्मेदारियाँ काबिल सरकारी संस्थानों और शिक्षाविदों को सौंपी जाएँ;
परीक्षाओं की आउटसोर्सिंग बंद की जाए;
राज्य-स्तरीय टेस्ट के ज़रिए एडमिशन हो और स्कूली परीक्षाओं के मार्क्स को भी उचित महत्व दिया जाए;
छात्रों की काबिलियत और योग्यता तय करने के लिए सिर्फ़ मल्टीपल चॉइस क्वेश्चन (MCQ) पर आधारित एक ही स्टेज का टेस्ट न हो। मल्टीपल स्टेज वाली टेस्टिंग प्रोसेस से ऐसे छात्रों की पहचान और चयन होना चाहिए जो समुदायों की सेवा करें, न कि सिर्फ़ अपने फ़ायदे के लिए काम करने वाले लोग बनें;
राज्य सरकारें काबिल छात्रों को एंट्रेंस टेस्ट की तैयारी में मदद करने के लिए स्पेशल कोर्स चलाएँ, न कि उन्हें प्राइवेट कोचिंग क्लास में भेजें;
मेडिकल एजुकेशन में प्राइवेट कोचिंग सेंटरों पर रोक लगे;
क्वेश्चन पेपर लीक होने के आधार पर "गेस पेपर" बेचने में शामिल सभी लोगों पर फ़ास्ट-ट्रैक न्यायिक प्रक्रिया के ज़रिए मुक़दमा चलाया जाए और सज़ा दी जाए;
केंद्रीय शिक्षा मंत्री इस्तीफ़ा दें।
: बेरोजगारी महंगाई नै युवा की नाड़ मोड़ दई 
संघर्ष ना करै इस करकै कांवड़ कांधे पै जोड़ दई
: बेरोजगारी महंगाई नै युवा की नाड़ मोड़ दई 
संघर्ष ना करै इस करकै कांवड़ कांधै जोड़ दई
: How India arrived at NEET as its ‘one nation, one exam’ 

 https://theprint.in/past-forward/india-neet-one-nation-one-exam/3006395/
: हरियाणा में पिछले सात वर्षों के दौरान कम छात्र संख्या के कारण लगभग 400 सरकारी स्कूलों का विलय (मर्ज) किया गया है। इनमें से छात्रों की संख्या बढ़ने पर 137 स्कूलों को दोबारा भी खोला जा चुका है।मुख्य कारण और विवरणकम छात्र संख्या: जिन स्कूलों में छात्रों की संख्या बहुत कम (मानकों से कम) थी, उन्हें पास के दूसरे स्कूलों में मिला दिया गया।दोबारा शुरुआत: विद्यार्थियों की संख्या में सुधार होने पर सरकार ने नियमों के तहत कई मर्ज किए गए स्कूलों को फिर से चालू किया है।आधिकारिक आंकड़े: हरियाणा के शिक्षा विभाग के अनुसार यह कदम संसाधनों के बेहतर उपयोग और सुचारू पढ़ाई के लिए उठाया गया है।क्या आप हरियाणा के किसी विशेष जिले के बंद या मर्ज किए गए स्कूलों के आंकड़े जानना चाहते हैं?हरियाणा के सरकारी स्कूलों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। प्रदेश के 37 स्कूलों में ...हरियाणा के सरकारी स्कूलों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। प्रदेश के 37 स्कूलों में एक भी छात्र नहीं है और 274 स्कूलों में 10 से कम बच्चे हैं। BJP सरकार न तो...Facebook·Kumari Seljaहरियाणा में सात साल में 400 सरकारी स्कूल बंद हुए, 137 दोबारा खुले - Jagranहरियाणा सरकार ने पिछले सात वर्षों में कम विद्यार्थियों के कारण 400 सरकारी स्कूलों को मर्ज कर दिया। इनमें से 137 स्कूलों को विद्यार्थियों की संख्या बढ़ने पर फिरJagranहरियाणा सरकार की चिराग योजना का AAP ने किया विरोध, कहा- सरकारी स्कूल बंद ...सरकारी स्कूलों में छात्रों की गिरती संख्या के पीछे का कारण हैं शिक्षकों की कमी और खराब बुनियादी ढांचे. इस कारण छात्र सरकारी स्कूलों को छोड़कर निजी स्कूलों में द...ABP News
: रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में 94,000 सरकारी स्कूल बंद हो गए हैं , यानी औसतन प्रतिदिन लगभग 25 स्कूल बंद हुए हैं। सरकारी स्कूलों की संख्या 2014-15 में 11.07 लाख से घटकर 2024-25 में 10.13 लाख हो गई है।
: 1950 में 97% अमेरिकी नागरिक पढ़ लिख सकते थे , जबकि चीन में सिर्फ 25-30% पढ़ लिख सकते थे ।

2026 में अमेरिका में सिर्फ 79% आबादी पढ़ लिख सकती है , जबकि चीन की 98% आबादी पढ़ - लिख  सकती है ।

कौनसी सरकार नागरिकों की बेहतर रिप्रेजेंटेटिव है ?
: MBBS Fees : नीट यूजी 2026 में थोड़े कम अंक होने के चलते प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस सीट तलाश रहे छात्रों के लिए बुरी खबर है। महाराष्ट्र के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस (MBBS) की पढ़ाई की फीस एक बार फिर बढ़ गई है। शैक्षणिक सत्र 2026–27 के लिए वार्षिक एमबीबीएस फीस 7.50 लाख रुपये से 17.13 लाख रुपये के बीच तय की गई है। प्राइवेट एमबीबीएस की फीस में एक बार फिर इजाफा होने से नीट अभ्यर्थियों के अभिभावक नाराज हैं। इससे उनके परिवार के एजुकेशन बजट और एजुकेशन लोन की योजना पर बड़ा असर डाला है।

अभिभावक पहले से ही एमबीबीएस की साढ़े पांच वर्ष की पढ़ाई के दौरान ट्यूशन फीस, हॉस्टल, खाना,किताबें और अन्य खर्चों का हिसाब लगा रहे हैं, उनके लिए फीस में मामूली सालाना वृद्धि भी कुल खर्च में कई लाख रुपये का इजाफा कर सकती है। महाराष्ट्र फीस रेगुलटरी अथॉरिटी की ओर से मंजूरी की गई नई फीस लिस्ट में राज्य के 19 प्राइवेट एमबीबीएस कॉलेज शामिल हैं। पालघर स्थित वेदांता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज सबसे महंगा कॉलेज है, जहां वार्षिक फीस 17.13 लाख रुपये है। इसके बाद नागपुर का एनकेपी साल्वे इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज है, जिसकी फीस 15.62 लाख रुपये है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक सबसे कम फीस पुणे के भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में 7.50 लाख रुपये और सिंधुदुर्ग के SSPM मेडिकल कॉलेज में 7.64 लाख रुपये निर्धारित की गई है।
: आज के दिन हम एक ऐसी जगह पर खड़े हैं जहाँ से आगे कई रास्ते दिखाई देते हैं। आज का बेतुका विकास हमें जलवायु से जुड़ी बड़ी तबाही की ओर ले जा रहा है।
दूसरी तरफ असमान विकास से गरीबी बढ़ी है , जन का हाशिए पर धकेले जाना गुस्से में बढ़ोतरी ही कर रहा है ।
: Three Cs..Centralisation, Commercialisation and Communalisation of Education 
: देश की शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त
 देश की शिक्षा व्यवस्था को बदलने की जरूरत
 छात्र आंदोलन देश में हो रहा है
: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 भारतीय शिक्षा व्यवस्था को बदलने का एक बड़ा प्रयास है, लेकिन इसे जमीन पर उतारने में वित्त पोषण की कमी, बुनियादी ढांचे का अभाव, शिक्षकों के प्रशिक्षण की जरूरत, डिजिटल विभाजन और भाषा संबंधी जटिलताएं जैसी कई गंभीर चुनौतियां शामिल है
: जीडीपी का 6% हिस्सा शिक्षा पर खर्च करने का लक्ष्य है, जिसे पूरा करना और जुटाना एक बड़ी चुनौती है।ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के स्कूलों में पर्याप्त धन और सुविधाओं की कमी है।
: स्कूली शिक्षा को 10+2 से बदलकर 5+3+3+4 ढांचा देना आसान नहीं है।प्री-प्र प्राइमरी (बाल वाटिका) और वोकेशनल (व्यावसायिक) शिक्षा के लिए नए कमरे, लैब और उपकरण चाहिए।
: शिक्षक प्रशिक्षण और गुणवत्ता (Teacher Training)शिक्षकों को नई शिक्षण पद्धतियों और कौशल विकास के लिए प्रशिक्षित करना जरूरी है।योग्य और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी एक बड़ी बाधा है
: डिजिटल विभाजन (Digital Divide)ऑनलाइन शिक्षा और तकनीकी संसाधनों तक सबकी पहुँच समान नहीं है।ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और बिजली की अनियमितता डिजिटल शिक्षा को प्रभावित करती है।
: भाषा और त्रि-भाषा फार्मूला (Multilingualism)मातृभाषा में पढ़ाने और त्रि-भाषा फार्मूला को सही से लागू करने में राज्यों के बीच मतभेद व संसाधन की कमी है।
: The Ministry of Human Resource Development (MHRD), which is now known as the Ministry of Education (MoE), Government of India (GOI) has established the National Testing Agency (NTA) as an independent, autonomous and self-sustained premier testing organisation for conducting efficient, transparent and international standard tests in order to assess the competency of candidates for admission to premier higher education institutions.

NATIONAL ELIGIBILITY CUM ENTRANCE TEST [ NEET (UG) – 2026 ] will be conducted by National Testing Agency (NTA), as a common and uniform National Eligibility-cum-Entrance Test [(NEET (UG)] for admission to undergraduate medical education in all medical institutions. Similarly, as per Section 14 of the National Commission for Indian System of Medicine Act, 2020, there shall be a uniform NEET (UG) for admission to undergraduate courses in each of the disciplines i.e. BAMS, BUMS, and BSMS courses of the Indian System of Medicine in all Medical Institutions governed under this Act. NEET (UG) shall also be applicable to admission to BHMS course as per National Commission for Homeopathy Act, 2020. The languages in which the NEET (UG) 2026[...]
: Staff BreakdownPermanent Officials: 24 core permanent staff members.Contractual Staff: 73 individuals working on a contract basis.Outsourced Personnel: 124 data analysts, legal associates, and support staff.
: The National Eligibility cum Entrance Test (NEET) was proposed in 2010 by the Medical Council of India (MCI) to replace fragmented state and institutional tests with a single nationwide medical entrance exam. After debuting in 2013, facing a brief Supreme Court cancellation, and returning permanently in 2016, it became India's sole medical entrance exam.
: The National Eligibility cum Entrance Test (NEET) was proposed in 2010 by the Medical Council of India (MCI) to replace fragmented state and institutional tests with a single nationwide medical entrance exam. After debuting in 2013, facing a brief Supreme Court cancellation, and returning permanently in 2016, it became India's sole medical entrance exam.
: Before NEET existed, India’s medical entrance landscape was fragmented. The All India Pre-Medical Test (AIPMT) was conducted by the Central Board of Secondary Education (CBSE) from 1988 until 2013. Students also had to appear for multiple state-level entrance tests separately, making the process exhausting and unequal for students across different regions.
: The National Eligibility cum Entrance Test (NEET) was first proposed in 2012 and conducted for the first time on May 5, 2013. However, just weeks later, on July 18, 2013, the Supreme Court of India quashed NEET, ruling that the Medical Council of India (MCI) did not have the authority to impose a unified examination on all medical institutions across India

Saturday, 18 April 2026

mdu

APRIL 19
A SPECIAL DAY 
MAHARSHI DAYANAND UNIVERSITY ROHTAK'S FOUNDATION DAY 
Heartiest Greetings to all the faculty members, non-teaching employees, current students, alumni, retired teachers and non-teaching employees of MDU Rohtak on the occasion of FOUNDATION DAY.
MDU came into existence on April 19,1976.
Remembering all the faculty members, non-teaching staff, University functionaries( COEs, Registrars, Deans, Vice Chancellors) who worked steadfastly for growth & development of this varsity on this special day.
Acknowledging the efforts of all stakeholders in the progress journey of this varsity.
Proud of our Alumni who have kept and are keeping the MDU Flag fly high!
May our University rise to new heights of excellence in years to come!
#M.D.UNIVERSITY ROHTAK
#MDU MOVES AHEAD

Sunday, 29 March 2026

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020

लेख

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: उदय एवं वर्तमान
प्रभु सिंह

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 हम यहां तक कैसे पहुंचे ?

1980 के दशक में समाजशास्त्र अर्थशास्त्र, साम्राज्यवाद, अलग-अलग संघर्षों को कक्षा-कक्ष में ठीक प्रकार हो पढ़ाया जाता था। 1990 तक आते-आते बदलने लगी। मंडल आंदोलन, बाबरी विध्वंस, सोवियत संघ का पतन, उदारीकरण की नीतियों की शुरुआत, निजी पूंजीवाद को बढ़ावा, सार्वजनिक ढांचे को घटाना शुरू हो गया। बड़ी-बडी मिलों का खात्मा होने लगा। मिलों में स्थायी रोजगार की बजाय ठेकाप्रथा आने लगी। बड़ी भूमिका मध्य वर्ग ने भी निभाई। वेतन में अच्छी बढोतरी, घर-गाड़ी, विलासिता के साधन बढ़े। यह मध्य वर्ग का स्वर्णकाल साबित हुआ। पहचान की राजनीति का उद्भव हुआ। जात और धर्म भी आ गए। यह भी सही है, वह भी सही है, सत्य नाम की कोई चीज नहीं है। किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए तर्क, मानदंड, प्रक्रिया का कोई स्थान नहीं रहा। इनके बिना वस्तुनिष्ठ सत्य, सार्वभौमिक सत्य, वैज्ञानिक समझ असंभव है। राजनीति खतरनाक स्तर पर उभरकर आती है। खतरनाक, व्यक्ति निष्ठ विचार पनपने लगे। इन सभी से फासीवादी ताकतों को आगे बढने का मौका मिला।

आपातकाल के बाद जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो जनसंघ भी एक घटक के रूप में सरकार का हिस्सा बना। उन्होंने पहला निशाना इतिहास को बनाया। आर.ए. शर्मा तथा रोमिला थापर की पुस्तकें जलाई गई। उनका मत था कि जब तक इतिहास नहीं बदलेंगे हिन्दू राष्ट्र नहीं ला पाएंगे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में एन.सी.ई.आर.टी. की पुस्तकों को निशाना बनाया गया, लेकिन ज्यादा कुछ नहीं कर पाए। हिन्दुस्तान को अपनी परंपरा पर गर्व, उपनिवेशवाद की गलतियों को खत्म करना, सावरकर से लेकर नरेन्द्र मोदी तक इनकी समझ ब्रिटिश उपनिवेशवाद की समझ है। आडवाणी जी की सोमनाथ से यात्रा आरंभ कर बाबरी मस्जिद पर खत्म करना, मोदी जी का सोमनाथ जाना एक सोची समझी है रणनीति के ही परिणाम है। नफरती दीवारें बड़ी होती जा रही हैं। हिंदू राष्ट्रवाद के समर्थक नारा लगाते हैं- बंटेंगे तो कटेंगे, एक हैं तो सेफ हैं। लव जेहाद, गाय के नाम पर लिंचिंग, समाज में भय का माहौल, घरों को बुलडोजरों से जमींदोज करना जैसे कार्यों से सामाजिक एकता व गंगा जमुनी तहजीब को तार-तार कर रहे हैं। समता दिवस के अवसर पर इतिहासकार इरफान हबीब के दिल्ली विश्वविद्यालय में भाषण के दौरान दक्षिण पंथी विचारधारा के छात्रों ने उन पर पानी फेंका जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा उदारमत को समाज से समाप्त करने की कोशिश के ही परिणामस्वरूप हैं।

      शिक्षा में एकीकृत सांस्कृतिक संक्रमण ज्ञान प्रणाली या व्यापक रूप से "भारतीय ज्ञान प्रणाली की मुख्य धारा की शिक्षा के साथ एकीकरण है।" राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के सन्दर्भ में यह एक ऐसा ढांचा है जो भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, पारंपारिक ज्ञान, दर्शन और कौशलों को आधुनिक शिक्षा के साथ मिलाकर पढ़ाता है। यह भारतीय प्राचीन परंपराओं को जैसे गुरु-शिष्य, योग, आयुर्वेद आधारित ज्ञान, वेदों से लेकर आधुनिक विज्ञान तक सभी विषयों को एक साथ जोड़कर पढ़ना है।

शिक्षा का "वस्तुकरण" (Commodification ):

नीति के प्रावधानों ने शिक्षा को एक सार्वजनिक सेवा (public good) के बजाय एक बाजार-उन्मुख वस्तु (market-driven commodity) में बदल दिया है। अब गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच काफी हद तक परिवार की आय पर निर्भर हो गई है।

हाशिए के समुदायों पर असरः यह बढ़ता खर्च सबसे ज्यादा आर्थिक रूप से कमजोर और हाशिए के समुदायों (SC, ST, OBC, अल्पसंख्यक) को प्रभावित करता है। आरक्षण जैसी नीतियां भले ही कागज पर मौजूद हों, लेकिन शिक्षा के बाजारीकरण के कारण ये अपना व्यावहारिक अर्थ खोती जा रही हैं। आंकड़े बताते हैं कि निजी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों पर प्रति वर्ष औसतन र 25,000 खर्च होता है, जबकि सरकारी स्कूलों में यह खर्च मात्र ₹2,863 है। यानि निजी स्कूली शिक्षा सरकारी स्कूलों की तुलना में लगभग 9 गुना महंगी है।
    NEP 2020 में डिजिटल और ऑनलाइन शिक्षा पर बहुत जोर दिया गया है, लेकिन यह सुनिश्चित नहीं किया गया कि सभी वर्गों के छात्रों की इस तक पहुंच हो। देश के केवल 32.4% स्कूलों के पास कार्यात्मक कंप्यूटर हैं और सिर्फ 24.4% स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम की सुविधा है। यह डिजिटल बंटवारा ग्रामीण और सरकारी स्कूलों के छात्रों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है, जिससे शैक्षणिक असमानता और बढ़ जाती है। 
व्यावसायिक शिक्षा : अवसर या मजबूरी? नीति में सामान्य शिक्षा के साथ व्यावसायिक प्रशिक्षण को जोड़ने पर जोर दिया गया है, जिसके गंभीर सामाजिक निहितार्थ हो सकते हैं। व्यावसायिक शिक्षा पर यह जोर सामाजिक बशर्ते इन रूप से पिछड़े वर्गों के छात्रों के लिए एक मजबूरी बन सकता है। ऐतिहासिक रूप से, कुछ जातियां कुशल श्रम (जैसे बढ़ईगीरी, लोहारगिरी) से जुड़ी रही हैं। नीति में इस प्रकार के पाठ्यक्रमों को बढ़ावा देकर उन्हें उन्हीं पारंपरिक व्यत्रसायों तक सीमित रखने की कोशिश हो सकती है, न कि उन्हें आगे बढ़ने के नए अवसर प्रदान करने की। यह नीति भारत में पहले से मौजूद सस्ते और अनौपचारिक श्रम बाजार को और मजबूत कर सकती है। "कुशल श्रम" पर जोर देकर यह शिक्षा को केवल रोजगार केंद्रित बनाने की कोशिश करती है, न कि समग्र और आलोचनात्मक चिंतन वाले नागरिक तैयार करने की।

सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) का बढ़ता दायरे को बढ़ावा दिया गया है। पंजाब में अम्परसैंड ग्रुप (Ampersand Group) द्वारा सरकारी स्कूलों के प्रबंधन और राजस्थान में डेवलपमेंट इम्पैक्ट बॉन्ड (DIB) जैसे प्रयोग इस बात के उदाहरण हैं कि कैसे निजी क्षेत्र धीरे-धीरे सार्वजनिक शिक्षा के संचालन में अपनी भूमिका बढ़ा रहा है। NEP 2020 के निर्माण और कार्यान्वयन में विश्व बैंक (World Bank) जैसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। STARS (Strengthening Teaching-Learning
and Results for States) कार्यक्रम के तहत विश्व बैंक स्कूली शिक्षा की संरचना, पाठ्यक्रम और मूल्यांकन प्रणाली को प्रभावित कर रहा है। चिंतकों का मानना है कि यह एक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था है, जिसका उद्देश्य शैक्षणिक सुधार नहीं, बल्कि बाजार का विस्तार करना है। सरकार का "व्यावसायीकरण रोकना" महज एक दावा है, जबकि नीति की संरचना ही शिक्षा को बाजार के हवाले करने वाली है। इसे तीन प्रमुख रूपों में देखा जा सकता है:

1. ग्रेडेड ऑटोनॉमी (Graded Autonomy) स्वायत्तता के नाम पर वित्तीय बोझ का स्थानांतरण: नीति में उच्च शिक्षण संस्थानों (HEIs) को "ग्रेडेड ऑटोनॉमी" में देने का प्रावधान है। इसका मतलब है कि संस्थान बिना UGC की मंजूरी के नए कोर्स शुरू कर सकते हैं, फीस तय कर सकते हैं, और विदेशी फैकल्टी रख सकते हैं-बशर्तें इन सबका खर्च सरकारी फंडिंग से न होकर ट्यूशन फीस से उठाया जाए। यह प्रावधान सरकार को अपनी वित्तीय जिम्मेदारी से मुक्त करता है। यह "सेल्फ-फाइनेंसिंग कोर्स" के जरिए सार्वजनिक शिक्षा के निजीकरण का एक चालाकीपूर्ण तरीका है। विश्वविद्यालयों को फीस बढ़ाने या कॉरपोरेट से साझेदारी करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जिससे शिक्षा महंगी हो जाएगी और मुनाफा कमाने का उद्देश्य हावी हो जाएगा।

2. संस्थागत समेकन (Institutional Consolidation) - छोटे कॉलेजों का विलय या बंद होना: NEP 2020 में प्रति उच्च शिक्षण संस्थान न्यूनतम 3,000 छात्रों के नामांकन का लक्ष्य रखा गया है। भारत में 5% से भी कम संस्थानों में 3,000+ छात्र हैं। अधिकांश कॉलेज छोटे हैं, खासकर ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में स्थित कॉलेज, जिन्हें समानता (equity) को बढ़ावा देने के लिए ही - खोला गया था। 50,000 संस्थानों को घटाकर 15,000 - करने और 3,000 से कम छात्रों वाले कॉलेजों को बंद या विलय करने की योजना से क्षेत्रीय असमानताएं बढ़ेंगी। छोटे सरकारी कॉलेज बंद होंगे और छात्रों का रुझान निजी संस्थानों की ओर बढ़ेगा। सरकारी विद्यालयों में ड्राप आउट बढ रहा है। 3. विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए द्वार खोलने की नीति के अंतर्गत पहली बार विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपने कैंपस खोलने की अनुमति देती है। ये कैंपस उच्च फीस लेंगे, चुनिंदा प्रवेश पर आधारित होंगे और अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाएंगे। शोधकर्ताओं का मानना है कि जब "गुणवत्तापूर्ण शिक्षा" का मॉडल यही महंगे और बाजार अनुकूल संस्थान बन जाएंगे, तो समानता और समावेशन बुरी तरह प्रभावित होगा।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के निर्माण और कार्यान्वयन में फासीवादी ताकतों (विशेष रूप से संघ परिवार से जुड़े समूह) की भूमिका को कई अध्ययनों और रिपोर्टों में रेखांकित किया गया है। यह भूमिका प्रत्यक्ष नीति निर्माण से लेकर अप्रत्यक्ष सांस्कृतिक प्रभाव स्थापित करने तक फैली हुई है। शिक्षा पर हमले के केंद्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का दीर्घकालिक लक्ष्य है- हिंदू राष्ट्र की स्थापना। RSS के लिए राजनीतिक नियंत्रण से अधिक महत्वपूर्ण है सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करना। इसे प्राप्त करने के लिए शिक्षा को सबसे बड़ा माध्यम माना गया है। NEP 2020 को इसी दृष्टि को जमीन पर उतारने का एक साधन बनाया गया है। नीति में बार-बार "भारतीय ज्ञान प्रणाली", "भारतीय मूल्यों" और "भारतीय मिट्टी" से जुड़ने पर जोर दिया गया है। इन शब्दों का इस्तेमाल एक संकीर्ण, हिंदुत्व-केंद्रित पहचान को स्थापित करने के लिए किया जा रहा है, न कि भारत की बहुलतावादी संस्कृति को दर्शाने के लिए। NEP 2020 की आलोचना मुख्यतः तीन आयामों पर केंद्रित है, जिन्हें तीन 'सी' (Commercialization, Centralization and Communalization) का नाम दिया गया है।

1. व्यावसायीकरण (Commercialization)

नव-उदारवादी साझेदारी: नीति शिक्षा को लाभ का क्षेत्र बनाने पर बल देती है। इसमें निजी भागीदारी को बढ़ावा देना और सार्वजनिक शिक्षा के बजट में कटौती को वैध ठहराना शामिल है। यह "नव-उदारवादी-नव-फासीवादी गठजोड़" का परिणाम है, जहां अंतरराष्ट्रीय पूंजी के हित और हिंदुत्ववादी ताकतों का सामाजिक एजेंडा एक साथ काम कर रहे हैं। 2. केंद्रीकरण (Centralization )सत्ता का संकेंद्रण :UGC, AICTE जैसे मौजूदा नियामक निकायों को समाप्त कर एक छत्र संगठन के तहत लाने की प्रक्रिया को "सत्ता का पूर्ण केंद्रीकरण" बताया गया है, जिसे फासीवाद की मूलभूत विशेषता माना जाता है। राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) और राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (NRF) जैसे निकायों के गठन को शैक्षणिक स्वतंत्रता और लचीलेपन को समाप्त करने और राजनीतिक दुरुपयोग के उपकरण के रूप में देखा जा रहा है। यह केंद्रीकरण संघीय ढांचे पर भी हमला है। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों को केंद्रीय योजनाओं (जैसे PM-SHRI स्कूल) के लिए सहमत होने हेतु वित्तीय दबाव डाला जा रहा है, जिससे राज्य सरकारों की शिक्षा नीति बनाने की शक्ति कम हो रही है।
3. सांप्रदायिकरण (Communalization)

पाठ्यक्रम का हिंदुत्वीकरण :- यह सबसे स्पष्ट हमला है। पाठ्यक्रम में विज्ञान और इतिहास को विकृत करने की कोशिश की जा रही है। NCERT की पाठ्यपुस्तकों से इतिहास के बड़े हिस्सों को हटाया जा रहा है, विशेष रूप से मुस्लिम शासनकाल और भारत की बहुलतावादी विरासत से जुड़े अध्याय । प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर के अनुसार, ऐसा करके "अधिकार में बैठे लोग जो र पढ़ाते हैं, उसी से संतुष्ट रहने वाले नागरिक तैयार करना है, बिना किसी सवाल के"। कक्षा 9 और 10 की पाठ्यपुस्तकों से डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को हटाना इस बात का उदाहरण है कि कैसे धार्मिक रूढ़िवादिता को वैज्ञानिक तथ्यों पर हावी किया जा रहा है। इसे हिंदुत्ववादी ताकतों द्वारा विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर हमले के रूप में देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री जी द्वारा प्लास्टिक सर्जरी का प्रमाण गणेश के माध्यम से डॉक्टर की जनसभा में देना और डॉक्टर द्वारा तालियां बजाना, मोर का आंसुओं से प्रजनन, पंचगव्य-गोबर, मूत्र, दूध, दही और घी सभी रोगों की दवा और इन्हीं के अनुसंधान पर बल देना इन्हीं हमलों के परिणामस्वरूप हैं। सूडो साइंस को बढ़ावा, सरस्वती प्रोजेक्ट, मंत्रोच्चारण से मरीज में क्या सुधार आया, गाय का गोबर परमाणु विकिरणों को रोकने में सहायक पर अनुसंधान पर बल दिया जा रहा है। बाबाओं का  बोलबाला है जो जनता को अंधविश्वास में डालकर उनका आर्थिक, शारीरिक व मानसिक शोषण कर रहे हैं।

संघीय ढांचे को कमजोर करनाः
   “विकसित भारत शिक्षा अधिक्षण बिल" जैसे प्रस्तावों के माध्यम से उच्च शिक्षा के लिए एकल, केंद्रीयकृत नियामक संस्था बनाने की कोशिश की जा रही है। यह शिक्षा के समवर्ती सूची में होने के बावजूद राज्यों की भूमिका को सीमित करता है और संघीय ढांचे को कमजोर करता है। इस बिल में अनुदान वितरण की जिम्मेदारी सीधे शिक्षा मंत्रालय को देने का प्रस्ताव है, जिससे फंडिंग प्रक्रिया मनमानी और राजनीतिक प्रभाव के अधीन हो जाएगी। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) जैसी संस्थाओं में संघ से जुड़े लोगों को नियुक्त करके इतिहास के पुनर्लेखन की प्रक्रिया को तेज किया गया है। इन नियुक्तियों का उद्देश्य महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथों की ऐतिहासिकता सिद्ध करना और जाति प्रथा का महिमामंडन करना है। शिक्षा पर हमले का सबसे हिंसक और दृश्यमान रूप उन लोगों पर हमला है जो सवाल उठाते हैं या असहमत हैं।

कैंपस में हमले और दमनः जेएनयू, जामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय और एफटीआईआई सहित देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में फासीवादी हमले देखे गए हैं।

छात्रों पर हमले, उन्हें निलंबित करना और उनके खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज करना आम बात हो गई है। छात्र राजनीति पर हमलाः जेएनयू और दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय (SAU) में छात्र विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, जिससे छात्रों की अभिव्यक्ति और सक्रियता कमजोर हुई है। छात्रसंघ चुनावों को प्रभावित करने और उन्हें भंग करने की कोशिशें भी लगातार हो रही हैं। स्कॉलर्स एट रिस्क (SAR) की रिपोर्ट के अनुसार, धमकी और खतरे के कारण कई शिक्षाविदों ने अपना महत्वपूर्ण कार्य वापस ले लिया है या इस्तीफा दे दिया है। इससे शिक्षा के क्षेत्र में आत्म-सेंसरशिप को बढ़ावा मिला है। इन हमलों का नतीजा संख्याओं में भी साफ देखा जा सकता है। स्कॉलर्स एट रिस्क (SAR) की "फ्री टू थिंक 2024"- रिपोर्ट के अनुसारः शैक्षणिक स्वतंत्रता सूचकांक वर्ष 2013 और 2023 के बीच भारत का स्कोर 0.6 से - गिरकर 0.2 हो गया है। 0.2 के इस स्कोर के साथ भारत अब "पूर्णतः प्रतिबंधित" श्रेणी में आ गया है, जो 1940 के दशक के मध्य के बाद से सबसे कम स्कोर है।

आधुनिक फासीवादी ताकतें खुले तौर पर - तानाशाही की बात नहीं करर्ती, बल्कि "लोकतंत्र" और "मुक्ति" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके अपने अभियान को सही ठहराती हैं। सूचना पर नियंत्रण और झूठ का सहारा भय और अराजकता पैदा करके सत्तावादी समाधान थोपना, सत्य के प्रति अविश्वास पैदा करना अपराध दर गिरने के बावजूद शहरों को "हिंसक गिरोहों" से भरा बताना, आपदा में राष्ट्रवाद फैलाना, भाषा और राजनीतिक बहस का दुरुपयोग "लोकतंत्र" और "मुक्ति" जैसे शब्दों को हथियाना, विरोधियों व मुसलमानों को "आतंकवादी" या "देशद्रोही" करार देना आप्रवासियों को "देश पर आक्रमण" करने वाला बताना, एलजीबीटीक्यू समुदाय को "बच्चों के लिए खतरा" करार देकर उनके प्रति हिंसा को बढ़ावा दिया जाता है।

फासीवादी ताकतों के लिए विश्वविद्यालय और स्कूल सबसे बड़े दुश्मन हैं, क्योंकि ये संस्थान आलोचनात्मक चिंतन और बहुलतावादी दृष्टिकोण को बढ़ावा देते हैं। ये ताकतें शिक्षकों और प्रोफेसरों को "मार्क्सवादी" और "देशद्रोही" करार देकर उनकी विश्वसनीयता खत्म करने की कोशिश करती हैं। जे.डी. वेंस जैसे नेताओं ने खुले तौर पर कहा कि "प्रोफेसर दुश्मन हैं"।

इन हमलों का मुकाबला करने के लिए यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ झूठ का मुकाबला करने से कहीं आगे की लड़ाई है। यह सुनिश्चित करना है कि हम सत्य की अवधारणा में विश्वास न खोएं। मजबूत लोकतांत्रिक संस्थानों की रक्षा करना, शिक्षा को स्वतंत्र रखना और समाज में फैलाई जा रही नफरत और डर की राजनीति को लगातार उजागर करना इस वैश्विक चुनौती से निपटने के प्रमुख उपाय हैं।

'जुल्म के साये लब खोलेगा कौन और अब हम भी चुप रहे तो बोलेगा कौन ?'


Sunday, 12 October 2025

पहचान की राजनीति

पहचान की राजनीति और शिक्षा पर हमला
दक्षिणपंथी रणनीति, संगठनात्मक विखंडन और मानवतावादी प्रतिरोध
✍️ कृष्ण नैन, हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ
🔶 प्रस्तावना: पहचान का युग और चेतना का संकट
आज का समाज “पहचान” की राजनीति से संचालित हो रहा है — धर्म, जाति, लिंग, क्षेत्र और वर्ग की दीवारें लगातार ऊँची की जा रही हैं। यह केवल सामाजिक विभाजन नहीं, बल्कि चेतना को नियंत्रित करने की राजनीतिक रणनीति है।
शिक्षा, जो समाज की आत्मा है, इस विभाजन का सबसे बड़ा शिकार बन चुकी है। दक्षिणपंथी ताकतें शिक्षा को अपने दीर्घकालिक सत्ता नियंत्रण का साधन बना रही हैं।
🔶 पहचान की राजनीति: संघर्ष से सत्ताकरण तक
पहचान की राजनीति का आरंभ उत्पीड़न और असमानता के खिलाफ हुआ था, लेकिन जब यह वर्गीय एकता और सामाजिक न्याय से कटकर केवल समूह-विशेष के हित तक सीमित हो जाती है, तो यह सत्ता और पूंजी के लिए सबसे उपयोगी औजार बन जाती है।
विश्व स्तर पर नवउदारवादी नीतियाँ चाहती हैं कि समाज छोटे-छोटे समूहों में बँट जाए — ताकि न कोई साझा संघर्ष हो, न कोई संगठित विरोध।
🔶 शिक्षा पर राजनीतिक नियंत्रण की रणनीति
भारत में शिक्षा अब विचार निर्माण का नहीं, विचार नियंत्रण का माध्यम बन चुकी है।
धार्मिक राष्ट्रवाद के नाम पर इतिहास और समाजशास्त्र को बदला जा रहा है; वैज्ञानिकता की जगह मिथक स्थापित किए जा रहे हैं।
इसके समानांतर, शिक्षक वर्ग को वर्ग, केटेगरी, भर्ती वर्ष, पद और जाति के नाम पर बाँट दिया गया है।
हर श्रेणी का अपना संगठन बना है — प्राथमिक, माध्यमिक, अतिथि, लैब, कंप्यूटर, पीजीटी, जेबीटी — जिससे शिक्षकों की सामूहिक शक्ति लगातार कमजोर हुई है।
🔶 संगठनात्मक विखंडन: संघर्ष की ताकत का ह्रास
पहले शिक्षक संगठन शिक्षा बचाने की सामूहिक आवाज़ हुआ करते थे।
अब अनेक संगठन केवल अपने वर्गीय हित या वेतनमान की मांगों तक सिमट गए हैं।
इस बिखराव ने विभागीय एकता और सामाजिक सरोकार दोनों को क्षीण किया है।
जब तक शिक्षक एक मंच पर नहीं आएँगे, तब तक
निजीकरण,
ठेकेदारी, अनियमित शोषित रोजगार, पैशन विहिन रोजगार 
गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ,
और सांप्रदायिक पाठ्यक्रमों के खिलाफ
अध्यापक संघ के अलावा कोई प्रभावी प्रतिरोध संभव नहीं हो पा रहा हैं।
🔶 दक्षिणपंथ की दीर्घकालिक योजना
यह सब आकस्मिक नहीं है।
सत्ता की दक्षिणपंथी - गैर बराबरी सोच पहचान की राजनीति को योजनाबद्ध ढंग से बढ़ावा देती है।
पहले “धार्मिक एकता” के नाम पर एक कृत्रिम राष्ट्रवाद गढ़ा जाता है,
फिर उसी के भीतर जाति, क्षेत्र, और पेशागत (नौकरी- पद) पहचानें बनाकर जनता/शिक्षकों को आपस में भिड़ा दिया जाता है।
शिक्षा क्षेत्र में इसका रूप और भी गहरा है —
सरकार खुद विरोधाभासी आदेश देकर भ्रम पैदा करती है,
फिर शिक्षकों को ही दोषी ठहराकर बदनाम करती है।
यह सब जनता के मन में सरकारी स्कूल और शिक्षकों के प्रति अविश्वास पैदा करने की सोची-समझी चाल है।
🔶 धर्म, जाति, केटेगरी और लिंग के सवाल पर महत्वाकांक्षा:-
धर्म और जाति की पहचान को सत्ता ने हमेशा वर्चस्व बनाए रखने के लिए उपयोग किया है।
आज शिक्षा संस्थान भी इससे अछूते नहीं हैं।
पाठ्यक्रम में धार्मिक प्रतीकों का बढ़ता उपयोग,
जातिगत संगठनों का फैलाव,
और महिला शिक्षकों के प्रति असमान दृष्टिकोण —
ये सब इस बात के प्रमाण हैं कि पहचान की राजनीति ने शिक्षा के लोकतांत्रिक ढाँचे को गहराई से प्रभावित किया है।
इसका प्रतिकार केवल संवैधानिक समानता, वैज्ञानिक दृष्टि और मानवीय सोच से ही संभव है।
🔶 पूंजी और शिक्षा का बाज़ारीकरण
नवउदारवादी दौर में शिक्षा को “सेवा” नहीं बल्कि “निवेश” के रूप में देखा जाने लगा है।
निजी स्कूलों को सरकारी मदद, सरकारी स्कूलों की उपेक्षा, और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर निर्भरता —
इन सबने शिक्षा को एक वस्तु में बदल दिया है।
यहाँ तक कि “संस्कार” और “राष्ट्रवाद” के नाम पर भी बाजार खड़ा किया जा रहा है।
इस परिस्थिति में पहचान आधारित आंदोलन पूंजी के हितों को ही मजबूत करते हैं क्योंकि बँटा हुआ समाज कभी संगठित प्रतिरोध नहीं कर सकता।
🔶 मानवतावादी और प्रगतिशील दृष्टि की आवश्यकता
अब वक्त है कि शिक्षक अपने संगठनों की सीमाएँ तोड़ें और शिक्षा के व्यापक जन-सरोकारों को केंद्र में रखते हुए सांझा मंच पर आएं।
हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ  पहचान आधारित बिखराव के विरुद्ध मुद्दों पर आधारित व्यापक एकता की कोशिश में लगा रहता हैं। जिसमें सभी को मिलकर 
वैज्ञानिक दृष्टिकोण,
सामाजिक समानता,
और लोकतांत्रिक शिक्षा
की वैचारिक पुनर्स्थापना करनी चाहिए।
संगठन को केवल “ शिक्षक मंच” नहीं, बल्कि जनशिक्षा आंदोलन का हिस्सा बनना होगा।
🔶 समाधान: एकता, विचार और संघर्ष
मानवतावादी दृष्टिकोण के बिना न शिक्षा बचाई जा सकती है, न समाज।
इसलिए आवश्यक है कि:
शिक्षक संगठन जाति, वर्ग या पद की सीमाओं से ऊपर उठकर साझा मोर्चा बनाएं।
शिक्षा के बाज़ारीकरण और सांप्रदायिकरण के खिलाफ वैचारिक आंदोलन चलाया जाए।
छात्रों, अभिभावकों और सामाजिक संगठनों को साथ लेकर शिक्षा बचाओ–समाज बचाओ का जनअभियान खड़ा किया जाए।
🔶 निष्कर्ष: पहचान से आगे, समानता की ओर
पहचान की राजनीति जहाँ उत्पीड़न के खिलाफ आवाज़ देती है, वहीं सत्ता और पूंजी के हाथों में वह विभाजन का औजार बन जाती है।
आज आवश्यकता है —
कि शिक्षक, बुद्धिजीवी और नागरिक
संकीर्ण पहचान से ऊपर उठकर
समानता, वैज्ञानिक चेतना और मानवीय एकता की दिशा में खड़े हों।
यही लोकतांत्रिक शिक्षा की असली पहचान और भविष्य है।
🕊️ “शिक्षा केवल ज्ञान नहीं, समाज के पुनर्निर्माण की चेतना है। और जब शिक्षक एकजुट होते हैं — तो समाज बदलता है।”
— कृष्ण नैन
उप महासचिव 
(हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ )

Monday, 6 October 2025

nep

06.10.2025
Meeting of the Democratic Forum, Rohtak held on 05.10.2025
A Discussion on Five Years of New Education Policy (NEP-2020) in Higher Education in Haryana

(This note is based on the main issues highlighted by the four invited speakers:  Prof. Narinder S. Chahar, Prof. Vanita Rose, Prof. Sunil Kumar & Mr Vinod Gill, a research scholar and the participants in Question-and-Answer session which followed the discussion: Prof. Surinder Kumar, President, Democratic Forum, Rohtak)
• Deterioration of Higher Education in Haryana accelerated with the introduction of semester system on ad-hoc basis in 2008-09. Syllabus was bifurcated into two parts and this became the syllabi of various subjects/disciplines at graduate and postgraduate levels. The teaching-learning process was crippled and examination schedule was completely dislocated as the external examination system and semester system were not compatible. Further, Choice Based Credit System (CBCS) was introduced without taking into consideration the necessary and sufficient conditions for its success i.e. no new faculty appointments, no additional subjects/courses in the universities and colleges were introduced. All this led to deterioration in the teaching learning process in the universities and colleges in Haryana. 
• Education is in the concurrent list of the Constitution of India. Further centralisation of education took place with the Central Government/UGC giving directives through the Governors of the states and Vice-Chancellors of the state universities e.g. controversies erupted in Tamil Nadu and Kerala.
• The Haryana State Government claims to have implemented NEP-2020 fully by 2025. However, ground realities do not corroborate the claim.  
• No legislative/regulatory steps have been taken by the state government to enhance the autonomy of the universities (the EC and the AC) and the colleges. No change in the college affiliation system with the universities has been brought about. The process of appointment of the VCs in the universities remains centralised, and the political leadership and bureaucracy rule the roost. Other administrative functionaries like Dean Colleges, Director Distance Education, Dean Students Welfare etc. are appointed on ad-hoc basis and teaching faculty is burdened with these responsibilities, thereby compromising teaching and research in the teaching departments. In fact, the old ad-hoc system continues – which is not in consonance with the requirements of the NEP- 2020. 
• Gross Enrolment Ratio (GER) in Haryana was 31% (2020-21). There is no clear roadmap to raise it to 50% by 2035 as required under the NEP-2020. In Haryana’s Colleges (Government, Aided and Private Colleges), for the post-graduate courses only 39% students’ seats are filled up and for graduate classes, 51% seats are filled up, apparently due to increasing fee, decrease in scholarships, and poor quality of education. Drop-out rates are high, absentee enrolment of students is increasing, many students take admission for concessional bus passes only and attend private coaching classes for vocations. There is a sharp decline in enrolment of students in basic sciences in the colleges. Dalit students are suffering the most. However, enrolment in the Distance Education mode is increasing. 
• As of now, there is no appointment of new teaching faculty in colleges and universities, even the existing 40-50% posts are lying vacant, what to talk about adding to the teaching faculty positions to revamp higher education and enhance Gross Enrolment Ratio. At best, research scholars and contractual teachers are appointed to fill the gap of teaching workloads in the colleges and universities, what to talk of quality teaching and research.
• There has been little effort to build capacities of the teaching faculty in the universities to restructure academic curriculum to meet the requirements of the NEP-2020. As senior faculty positions in most of the teaching departments are lying vacant, the task of restructuring courses and curriculum in the holistic multi-disciplinary/inter-disciplinary framework becomes all the more difficult.  
• Efforts have been made to restructure academic curriculum within the National Higher Education Qualifications Framework (NHEQF). However, as the teachers were not familiar with the requirements of NHEQF, the quality of curriculum and syllabi has been compromised. It has led to ad-hocism in the course-structures of various disciplines.
• The spirit of Liberal Arts education in colleges is not feasible and is missing as the facilities to teach in more than two-three subjects in each stream is not there in colleges. There is hardly any student who opts for a combination of Physical Sciences – say, Physics - and Humanities/Social Science subjects like Music, Philosophy and Economics, in the colleges. 
• As almost all the teachers were trained in their own post-graduation education only in the (strictly) disciplinary framework, they have limited capacity to frame curriculum and teach in the holistic multi-disciplinary/inter-disciplinary framework.
• To evolve an accountable system of the teaching-learning process requires a cultural change like in JNU, IITs and IIMs. Regional universities and colleges need a massive transformation in their work culture for which teaching faculty needs to be trained and skilled. As of now, there are no signs of this happening on the ground. 
• The objectives of the Academic Bank of Credits are not clear to teachers as well as students. This has led to difficulties in its operationalisation. 
• A survey conducted by the Department of Education, M.D. University, Rohtak shows that most of the teachers in the university and colleges have no opinion about the NEP-2020 which would imply, they were not aware of its provisions. Only 7% teachers had positive opinion and 25% had negative opinion about the NEP-2020. In such a situation, NEP cannot be implemented successfully.
• For the capacity-building programmes conducted by the universities to address the concerns of the NEP-2020, only one teacher from each of the affiliated colleges was invited. It was an inadequate training programme and got reduced to being a ritual. 
• In some of the Education Colleges and Education Departments of universities in Haryana, Four-Year Integrated Teachers Education Programme has been introduced without adequate preparation. There are no guidelines for the programme till date. 
• The Vocational Education Programme in various classes at under-graduate levels was not well-conceived and was just a ritual. It is not administered well. Internships with local industries, businesses, civil society organisations/NGOs are just a formality and need to be revamped completely. The students are asked to bear the cost of internship programmes, which is very high.
• The spirit of NEP-2020 has been lost in the process of its implementation. It appears that policies are not for implementation but for documentation only. Campus democracy is under threat. What has emerged is centralisation, ad-hocism, commercialisation and privatisation of education. 
• In the name of Indian Knowledge System and value-based education, Hindutva/a communal agenda is being promoted. 
• Financing of Higher Education in Haryana: The State Government’s financial grants to universities as a share of their annual budgetary requirements has been consistently declining. The universities are financing their academic programmes through self-financing programmes, increases in the students’ fees and other annual charges, increase in the examination fees etc. Higher education has become expensive and unaffordable for the poor and even the middle class is feeling its pinch. This has led to drop in the Gross Enrolment Ratio (GER) in higher education institutions in the state, even though an increase in the GER is a major concern and aim of the NEP-2020. All India Federation of College and University Teachers Federation (AIFUCTO) has demanded that public education finances should be raised to 10% of the GDP, if we want to implement NEP effectively. 
• The gap between the students and the teachers is increasing. Cynicism and alienation is increasing. Dialogue between teachers and students needs to be established.

Monday, 4 August 2025

संघ का शिक्षा एजेंडा

संघ का शिक्षा एजेंडा : 
न पढेंगे पढ़ने देंगे 

० राजेंद्र शर्मा

यह संयोग हर्गिज नहीं है कि राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ या आरएसएस की स्थापना की शताब्दी के इस वर्ष में शिक्षा का क्षेत्र और उसमें भी खासतौर पर आरंभिक शिक्षा का क्षेत्र, लगातार खबरों में है। जाहिर है कि शिक्षा का यह क्षेत्र किन्हीं अच्छे कारणों से खबरों में नहीं है। यह नकारात्मक विवादों के लिए खबरों में है। इस क्रम में ताजातरीन विवाद, देश भर में स्कूली पाठ्यक्रमों के लिए मानक पाठ्यक्रम तथा पाठ्य पुस्तकें तैयार करने वाली केंद्रीय संस्था, राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद या एनसीईआरटी द्वारा आठवीं तक की कक्षाओं के लिए जारी की गई सामाजिक विज्ञान की और उसमें भी विशेष रूप से इतिहास की पाठ्य पुस्तकों को लेकर उठा है।

       विवादित पाठ्य पुस्तकों में, इन्हीं विषयों की पिछली पाठ्य पुस्तकों से जो भारी बदलाव किए गए हैं, उनका मुख्य मकसद भारतीय इतिहास की और विशेष रूप से मध्यकालीन इतिहास को आरएसएस की सांप्रदायिक धारणाओं तथा आग्रहों को, लड़कपन की उम्र से ही बच्चों के मन में, इतिहास के रूप में बैठाना है। सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इसके लिए की गई कतरब्योंत में मुस्लिम शासकों के दौर पर खासतौर पर कैंची चलाई गई होगी। यहां तक कि टीपू सुल्तान और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ उसकी लड़ाइयों का जिक्र तक, सिरे से गायब कर दिया गया है। सभी जानते हैं कि अपने राजनीतिक बाजुओं के जरिए, आरएसएस को जब भी देश की सत्ता तक किसी भी तरह से पहुंच हासिल हुई है. उसने बच्चों की पाठ्य पुस्तकों के सांप्रदायिक पुनर्लेखन पर खास ध्यान दिया है।

इस सिलसिले की औपचारिक शुरूआत तो 1978 में ही हो गई थी, जब इमर्जेंसी राज की हार के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार के माध्यम से, पहली बार आरएसएस के राजनीतिक बाजू, जनसंघ को केंद्र में सरकार तक पहुंच हासिल हुई थी। यह दूसरी बात है कि आरएसएस से संबंध के रूप में दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर, इमर्जेंसी के विरोध के आधार पर बनी जनता पार्टी में विभाजन हो गया, जिसका जनसंघ घातक नई राजनैतिक पार्टी का हिस्सा रहते हुए भी, आरएसएस के प्रति  वफादारी में बनाए रखने की छूट चाहता था। इस विभाजन के चलते जनता पार्टी की सरकार ज्यादा दिन नहीं चल पाई और चौतरफा विरोध के चलते जिसमें खुद जनता पार्टी के दूसरे घटकों में से विरोध भी शामिल था , स्कूली पाठ्य पुस्तकों का सांप्रदायिक पुनर्लेखन करने की ये  शुरुआती कोशिशें भी ज्यादा असर नहीं दिखा पाई।
         
          इन कोशिशों को बड़ा बढ़ावा मिला 1998 में भाजपा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनने के बाद। वाजपेयी सरकार में शिक्षा मंत्रालय, मुरली मनोहर जोशी ने संभाला, जो एक ओर अगर शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े रहे थे, तो दूसरी ओर आरएसएस के बहुत पुराने स्वयंसेवक थे। 2004 तक चले इस दौर में बाकायदा इतिहास के पुनर्लेखन की घोषणाएं की गयीं और इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में काट-छांट से लेकर, ज्योतिष, वास्तुशास्त्र जैसे पोंगापंथी विषयों को विधिवत पाठ्यक्रम में स्थान दिलाए जाने की शुरूआत की गयी। फिर भी, अब जो हो रहा है उसे देखते हुए, यह कहना ही पड़ेगा कि इतिहास का सांप्रदायिक पुनर्लेखन करने में मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में शिक्षा मंत्रालय को तब, कोई बहुत ज्यादा सफलता नहीं मिल पायी थी। बेशक, इसका संबंध इससे भी है कि इन कोशिशों का राजनीतिक ही नहीं अकादमिक हल्कों से भी जो तीखा विरोध हो रहा था, उसकी थोड़ी-बहुत प्रतिध्वनि तत्कालीन सरकार में भी सुनाई देती थी, जो गठबंधन की मजबूरियों से भी मुक्त नहीं थी। फिर भी शिक्षा की धर्मनिरपेक्ष तथा जनतांत्रिक धारा को इस दौर में इतनी चोट तो पहुंचा ही दी गयी थी कि स्कूली शिक्षा को उसके धक्के से उबारते हुए, दोबारा पटरी में लाने के लिए, यूपीए के राज में काफी बड़ी कवायद करनी पड़ी थी।
          

           2014 से भाजपा के नेतृत्व में, गठबंधन की मजबूरियों से मुक्त और आरएसएस के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से युक्त सरकार आने के बाद से, 2004 में अधूरे छूट गए इतिहास के सांप्रदायिक पुनर्लेखन को आम तौर पर और स्कूली शिक्षा में खासतौर पर, ताबड़‌ तोड़ आगे बढ़ाया गया है। आठवीं कक्षा तक की पाठ्य पुस्तकों का लगभग पूर्ण सांप्रदायीकरण, जिस पर इस समय बहस सुनाई दे रही है, इसी लंबी प्रक्रिया का नतीजा है। ताजातरीन झटके में, एक ओर तो मुस्लिम शासनों की चर्चा को इतना सिकोड़ दिया गया है कि रजिया सुल्तान तथा नूरजहां जैसे ताकतवर शासकीय व्यक्तियों का जिक्र ही गायब कर दिया गया है, तो दूसरी ओर बाबर से लेकर औरंगजेब तक, सभी मुगल शासकों को आधुनिक अर्थ में क्रूर, दमनकारी तथा धार्मिक अत्याचार करने वाले शासकों के रूप में चित्रित किया गया है और अकबर तक को नहीं बख्शा गया है। उसी परियोजना के दूसरे पहलू के रूप में हिंदू राजाओं के ठीक इन्हीं "गुणों" का जिक्र ही न करते हुए, उनका ज्यादा से ज्यादा महिमा मंडन किया गया है।
 
         लेकिन, बात सिर्फ मुस्लिम शासकों को काले रंग से पोते जाने तक सीमित नहीं रहती है। इससे आगे, बाकायदा एक सामान्यीकरण तक भी जाती है, जिसमें खासतौर पर भारतीय इतिहास के मुस्लिम दौर को " अंधेरे दौर" या अंधकार युग 
के रूप में चिन्हित किया गया है। यह सांप्रदायीकरण के सिलसिले को, गुणात्मक रूप से एक नये स्तर पर पहुंचा देता है। दिलचस्प यह है कि आधुनिक भारतीय इतिहास लेखन के इतिहास की जानकारी नहीं रखने वालों को ही "अंधेरे दौर" की इस खोज में, कुछ भी नया लग सकता है। वास्तव में यह भारतीय इतिहास लेखन के उस पश्चिमी औपनिवेशिक मॉडल की ही नई पैकेजिंग है, जिसमें ब्रिटिश-पूर्व भारतीय इतिहास को मोटे तौर पर मुस्लिम पूर्व प्राचीन काल और मुस्लिम मध्यकाल

में विभाजित किया जाता था। इसमें प्राचीन गौरवपूर्ण या स्वर्णयुग था और मध्यकाल, इस गौरव के हरण का काल यानी इस दृष्टि के हिसाब से हिंदुओं और मुसलमानों के अनवरत टकराव का काल या हिंदुओं के दमन का काल। लेकिन, इस नई पैकेजिंग में भी नया सिर्फ इतना है कि योरपीय इतिहास के काल विभाजन में मध्य युग के लिए "डार्क एज" की जिस संज्ञा का प्रयोग किया जाता है, उसी को उठाकर ज्यों का त्यों अनुवाद करके रख दिया गया है। गैर-प्राचीन भारतीय इतिहास की, योरपीय इतिहास से भिन्नता की कोई थोड़ी-बहुत गुंजाइश अब तक रहती भी थी तो उसे, इस "अंधकार युग" के आयात से पाट दिया गया है।

      स्कूली पाठ्य पुस्तकों के इस प्रसंग से ठीक पहले, स्कूली शिक्षा से ही संबंधित जो प्रसंग चर्चा में था, उसका संबंध हजारों की संख्या में सरकारी स्कूलों के बंद किए जाने से है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में यह मामला चर्चा में आया था, जहां इसी साल स्कूलों के मर्जर के नाम पर 5 हजार से ज्यादा स्कूलों के बंद किए जाने की खबर आई है। सत्ताधारी भाजपा के बहुत
ही सख्त मीडिया नियंत्रण के बावजूद, सोशल मीडिया में और थोड़ा-बहुत परंपरागत मीडिया में भी, अपने स्कूल बंद किए जाने के खिलाफ छोटे-छोटे स्कूली बच्चों के भावुक करने वाले प्रदर्शनों ने ध्यान खींचा है। ये बच्चे रो-रोकर सरकार से गुहार लगा रहे थे कि उनके स्कूल बंद नहीं किए जाएं। इसी क्रम में जगह-जगह पर लगाए गए एक बैनर ने भी ध्यान खींचा- मधुशाला नहीं, पाठशाला ! दरअसल, यह बैनर भी तब वाइरल हुआ जब योगी प्रशासन इस बैनर को हर जगह से हटवाने के लिए, सड़कों पर उतरा।

      कहने की जरूरत नहीं है कि मर्जर या तार्किकीकरण आदि, आदि नामों से, छात्रों की संख्या पचास से कम होने के आधार पर, सरकारी स्कूलों को ही बंद करने के इस खेल की, उत्तर प्रदेश-मध्य प्रदेश जैसे उत्तर भारतीय राज्यों में, जहां पढ़ाई का स्तर आम तौर पर काफी दरिद्र है, गरीबों की शिक्षा पर बहुत भारी मार पड़ रही है। याद रहे कि स्कूलों का बंद  किया जाना, भाजपा सरकारों की नीति का ही हिस्सा है। तभी तो 2014 से अब तक, देश भर में पूरे 89,441 स्कूल इस तरह से बंद किए जा चुके हैं। और इनमें से 60 फीसद स्कूल भाजपा-शासित मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश में ही बंद किए गए हैं। इस सब को देखते हुए हैरानी की बात नहीं है कि 2021 से 2024 के बीच तीन साल में देश भर में, पहली से आठवीं कक्षा तक के दो करोड़ छात्र पढ़ाई छोड़कर घर बैठ गए हैं। उत्तर प्रदेश में ही, जहां इस साल पांच हजार स्कूलों को बंद किया जा रहा है, 2022-23 और 2023-24 के बीच, 1,33,035 सरकारी प्राइमरी तथा मिडिल स्कूलों में, छात्रों के दाखिलों में पूरे 24 लाख की कमी हुई थी। इस तरह, नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के नाम पर, स्कूली शिक्षा के बुनियादी ढांचे को ही ढहाया जा रहा है। जाहिर है कि यह शिक्षा के निजीकरण जैसे राजनीतिक स्वार्थों के लिए झूठे बहाने तलाश करने का ऐसा खेल है, जिसमें छात्रों के वास्तविक हितों की आहुति दी जा रही  एनईपी की आड़ में और आरएसएस के एजेंडे के खातिर, स्कूली शिक्षा के ही ध्वस्त किए जाने का ऐसा ही एक और प्रसंग जो पिछले दिनों चर्चा में रहा है, स्कूली शिक्षा में हिंदी थोपे जाने की कोशिशों का है। वैसे यह कोशिश हिंदी थोपने पर ही रुकने वाली नहीं है। जम्मू-कश्मीर से आ रहीं, उप-राज्यपाल के नेतृत्व में राज्य में स्कूली बच्चों पर संस्कृत थोपे जाने की खबरें, इस मुहिम के अगले चरण की ओर इशारा कर देती हैं, जिसमें माध्यम के रूप में लादी जाने वाली एक परायी (मातृभाषा इतर) भाषा का बोझ, शिक्षा के प्रयास की कमर ही तोड़ने जा रहा है। बहरहाल, जैसा कि महाराष्ट्र का पहली कक्षा से हिंदी अनिवार्य करने की कोशिश के व्यापक प्रतिरोध का अनुभव दिखाता है, इस तरह की कोशिशें आसानी से लोगों को हजम होने वाली नहीं हैं। तमिलनाडु के बाद, महाराष्ट्र में भी मोदी सरकार को त्रिभाषा फार्मूला थोपने की अपनी कोशिशों को वापस लेना पड़ा है। लेकिन, जाहिर है कि उस टकराव के बाद, जिसमें आम तौर पर शिक्षा का और खासतौर पर हिंदी का भी नुकसान तो हो चुका था।

          लेकिन, सत्ताधारी संघ-भाजपा के लिए, उसकी हिंदी को आगे बढ़ाने की मुहिम भी तो, उसके विभाजनकारी प्रचार का ही हिस्सा, जहां हिंदी को "शासक की भाषा" के रूप में थोपने की कोशिश की जाती है। इससे हिंदी की कितनी प्रगति होती है या दुर्गति होती है, इसकी उन्हें परवाह नहीं है। इसीलिए, वे कभी इसकी चिंता करते नहीं मिलेंगे कि क्या हुआ कि मध्य प्रदेश में तीन साल पहले बड़े तामझाम के साथ, मैडीकल की पढ़ाई हिंदी में कराने के लिए हिंदी में पाठ्य पुस्तकें तैयार कराने तथा धूम-धड़ाके से उनके जारी किए जाने के बाद, अब यह सच सामने आ रहा है कि राज्य के किसी भी मैडीकल कालेज में एक भी छात्र ने हिंदी में परीक्षा नहीं दी है।
लोक लहर 


Saturday, 19 July 2025

ज्ञान विज्ञान आंदोलन

 Draft for discussion

1980 के दशक में पार्टी में जनतांत्रिक-वामपंथी राजनीति के सामने हरियाणा के समाज में मौजूद चुनौतियों की पहचान करने के लिए बहस हुई। इस बहस में हरियाणा के बारे में जाति-पितृसत्ता की मज़बूत जकड़न को चिह्नित  किया गया और साथ ही यह अवलोकन स्पष्ट तौर पर किया गया कि हमारे समाज में कृषि में हरित क्रांति के साथ-साथ जो औद्योगिक प्रगति हुई है, उसका लाभ तो शिक्षित मध्य वर्ग को मिला है। इसके चलते हरियाणा की आबादी के एक बड़े हिस्से की आर्थिक स्थिति मज़बूत हुई है लेकिन सामाजिक-सांस्कृतिक पिछड़ापन बड़े पैमाने पर व्याप्त है। इस बहस में स्पष्ट हुआ कि हरियाणा में अर्ध-सामंती मूल्यों पर आधारित जातीय वर्चस्व, पितृसत्ता और पुरुष प्रधानता की मान्यता है; और सामाजिक सम्बन्धों का आधार यही मान्यता है। इसके चलते महिलाओं और दलित-पिछड़ी जातियों का उत्पीड़न आम घटनाक्रम है। इसी के साथ नवधनाढ्य वर्ग में सत्ता की भूख, जोड़-तोड़ के साथ निजी तरक्की का रुझान और आत्मकेंद्रित सोच हावी है। आज़ादी के आंदोलन में पैदा हुए आदर्शवाद की कमज़ोर उपस्थिति आदि के चलते अवसरवादी, भाई-भतीजावाद पर आधारित एवं भ्रष्टाचार से लिप्त राजनीति का बोलबाला है। ऐसे वातावरण में जनवादी राजनीति की ज़मीन तैयार करना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसके लिए जनतांत्रिक चेतना, जातिवाद से इतर सोच, महिला-समानता आदि मूल्यों की समझ पैदा करने का कार्य बेहद ज़रूरी है। इस कार्य की पहचान करने के पश्चात् इसे अमल में लाने के लिए सांगठनिक ढांचों  के निर्माण की प्रक्रिया को शुरू किया गया। हरियाणा के कई ज़िलों में जनवादी सांस्कृतिक मंच/सांस्कृतिक मंच/डैमोक्रेटिक फ़ोरम, विचार मंच आदि खड़े किए गए। इन मंचों ने कई वर्षों तक जनतांत्रिक संस्कृति के निर्माण का काम किया जिसके फलस्वरूप पार्टी को अनेक कार्यकर्ता भी मिले। इन मंचों की पहुंच शहरी शिक्षित मध्यवर्ग में थी और इस वर्ग के लोगों के दिलो-दिमाग में सुप्तावस्था में पड़े आदर्शवाद को जगाने का कार्य तो किया ही गया, साथ ही प्रांत में अर्ध सामंती जकड़न पर खरोंच डालने का कार्य भी किया गया। सांस्कृतिक मंचों के लक्ष्य-उद्देश्य प्रगतिशील समाज के निर्माण की दिशा बनाने वाले थे जो आज भी सार्थक हैं। उस समय तक गांवों की ओर जाना और समाज के निचले तबकों तक पहुंच बनाने का कार्य होना बाकी था। लेकिन मध्यवर्ग के कई लोगों को इन प्रक्रियाओं से एक विश्वदृष्टि ज़रूर मिली जिसके चलते  कुछ लोग पार्टी के कार्यों में आज भी सक्रिय हैं। इसी दौर में 'प्रयास' और फिर 'जतन' नाम से पत्रिका भी प्रकाशित होती रही। यह पत्रिका भी वैचारिक आधार तैयार करने का कार्य कर रही थी। इस दौर में सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में हरियाणा की पार्टी ने गुणात्मक हस्तक्षेप करने की रणनीति तैयार कर ली थी और ठोस कार्य भी किए थे। हालांकि इस अनुभव का कोई प्रामाणिक विश्लेषण करता हुआ लिखित दस्तावेज़ तैयार नहीं हो सका, फिर भी यह सही है कि एक सकारात्मक पहल के रूप में इस अनुभव को पार्टी द्वारा दर्ज किया गया है। हरियाणा में यह कार्य चल ही रहा था कि 1987 में देश-भर में पार्टी द्वारा विज्ञान और तकनीक से जुड़े प्रश्नों को धर्मनिरपेक्षता, जनतंत्र और भाईचारे से जोड़ते हुए जनता के व्यापक हिस्सों के बीच जाने की समझ बनाई गई और 'भारत जन विज्ञान जत्था' देश के अलग-अलग हिस्सों में चलाया गया। इस जत्थे का मूल उद्देश्य जनता के साथ वैकल्पिक समाज की परिकल्पना को सांझा करना था और इस अभियान को जिन नारों से संचालित किया गया उनमें 'जनतंत्र के लिए  विज्ञान', 'धर्मनिरपेक्षता के लिए विज्ञान', 'राष्ट्रीय विकास और आत्मनिर्भरता के लिए विज्ञान' आदि थे। हरियाणा में भी  राष्ट्रीय जत्थे  का स्वागत हुआ और इसका प्रभाव भी सकारात्मक रहा। प्रांत में जो सांस्कृतिक/जनतांत्रिक मंच कार्यरत थे उनमें  भी विज्ञान के प्रश्नों पर विमर्श शामिल हुआ। अत: प्रांत में विज्ञान और जनता के बीच गहन सम्बन्ध बनाने का जो संदेश राष्ट्रीय जत्थे से मिल रहा था, उसी के मद्देनज़र  20 जून 1987 को 'हरियाणा विज्ञान मंच' की स्थापना हुई। शुरुआत से ही मंच के साथ विज्ञान के क्षेत्र के बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफ़ेसर, अध्यापक तथा अन्य कर्मचारी और सामान्य जन जुड़ गए। जो कार्य आरम्भ हुए, कार्य पद्धति विकसित हुई, परिप्रेक्ष्य बना - वे सब पूर्व की प्रक्रियाओं से गुणात्मक रूप से भिन्न थे। अब पूरा विमर्श विज्ञान और उसके विभिन्न पक्षों के इर्द-गिर्द बनने लगा। सांस्कृतिक मंचों के कार्यों से जो दृष्टि बनी थी, वह तो काम आई लेकिन उन कार्यों का संश्लेषण अथवा समेकन विज्ञान मंच के परिप्रेक्ष्य और कामों में नहीं हो पाया। इसी लिए जतन पत्रिका जो एक समय पर विमर्श को दिशा देने का कार्य कर रही थी, बंद हो गई।

विज्ञान मंच के शुरूआती दिनों में राष्ट्रीय जत्थे से निकले बिंदु, जैसे - आत्मनिर्भरता, धर्मनिरपेक्षता, समानता, न्याय और समतामूलक समाज के लिए विज्ञान आदि विज्ञान मंच के विमर्श के केन्द्र में रहे। साइंस बुलेटिन नामक पत्रिका भी शुरू की गई।  प्रारम्भिक वर्षों में विज्ञान मंच में वैचारिक विमर्श, मंच का प्रसार, पत्रिका प्रकाशन, ज़िलों पर इकाइयों का गठन आदि कार्य हुए लेकिन धीरे-धीरे मंच राष्ट्रीय सरकारी एजेसिंयों से प्रोजेक्ट आदि लेने की दिशा में बढ़ा। इनके संचालन तथा नियोजन के लिए न्यूनतम स्थापत्य, यानी दफ़्तर, मानदेय आधारित कार्यकर्ता, बैठकों आदि के लिए प्रायोजित खर्च, परियोजनाओं पर आधारित कार्यक्रमों का आयोजन, आने-जाने वालों को किराया-भाड़ा दे सकने के प्रावधान आदि  के चलते विज्ञान मंच की कार्य पद्धतियों में गुणात्मक परिवर्तन आ गए। धीरे-धीरे लोगों से सम्पर्क कम होते गए और दफ़्तरी प्रकियाएं (जिनमें न्यूनतम वित्त-उपलब्ध था) हावी होती गईं। यह एक चारित्रिक परिवर्तन था। अब शुरुआती विमर्श भी पीछे जाने लगा और परिप्रेक्ष्य की ओर भी ध्यान कम होता चला गया। परियोजनाओं के कार्यों, उनको जारी रखने की कोशिशों, वित्तीय प्रबंधन, प्रायोजित करने वाली  सरकारी एजेंसियों की बैठकों में समय लगने लगा। इसी दौरान हरियाणा विज्ञान मंच को राष्ट्रीय नेतृत्व के एक हिस्से की ओर से विकास केंद्र (डेवलपमेंट सेंटर) की परियोजना लेने का प्रस्ताव पेश किया गया। इस केंद्र के ज़रिये ग्रामीण कारीगरों के हुनर-विकास का कार्य प्रमुखता से होना था जिसके आधार पर ये कारीगर बाज़ार के लिए उपयोगी वस्तुओं का उत्पादन कर सकें। यह केंद्र भी आय-वृद्धि के लिए प्रशिक्षण करने के साथ-साथ इन कारीगरों को संगठित करने और वैचारिक तौर पर विकसित करने का उद्देश्य लिये हुए था परंतु इसका अनुभव भी बुनियादी तौर पर विज्ञान मंच के अनुभव से अलग नहीं हो पाया। इस केंद्र में तो अंततः वित्तीय अभाव भी बन गया और इसे बंद ही करना पड़ा। विज्ञान मंच के अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि सरकारी परियोजनाओं में साधन तो उपलब्ध हुए, जैसा कि चमारिया में ज़मीन ली गई या आज़ादगढ़ में प्लॉट ले लिया गया लेकिन वैचारिक कार्य, सांगठनिक पद्धति और लोगों से जुड़ाव में कमज़ोरी आई।

1990 तक आते-आते पूरे देश में 1987 के जन विज्ञान जत्थे के उपरांत जो विज्ञान का विमर्श लोगों तक पहुंचा था, उसमें विस्तार करने की समझ बनने लगी और केरल शास्त्र साहित्य परिषद् द्वारा अरणाकुलम् में साक्षरता अभियान का प्रयोग किया गया, जिसे पूरे देश में ले जाने की समझ बनी। इसी उद्देश्य के चलते भारत ज्ञान-विज्ञान जत्था निकाला गया। इस जत्थे से देश-भर में साक्षरता अभियानों के प्रति एक आकर्षण बना और हरियाणा में 1991 में 'पानीपत की चौथी लड़ाई' के नाम से साक्षरता अभियान चला। इस अभियान में हरियाणा के अलग-अलग ज़िलों से पार्टी के कार्यकर्ता पानीपत गए और लगभग डेढ़ वर्ष तक वहीं रहकर कार्य किया। साक्षरता अभियानों का अन्य ज़िलों में भी फैलाव हुआ। पानीपत की परियोजना को 'भारत ज्ञान-विज्ञान समिति, पानीपत' के नाम से बनी संस्था द्वारा चलाया गया। साक्षरता परियोजनाओं में कार्य करते हुए 'जन सांस्कृतिक मंच' और 'हरियाणा विज्ञान मंच' के तमाम विमर्शों और परिप्रेक्ष्य को समाहित करते हुए कार्य नहीं हो पाया। हां, यह ज़रूर हुआ कि राष्ट्रीय पार्टी द्वारा देश-भर के लिए भारत ज्ञान-विज्ञान समिति का गठन किया गया और इसके माध्यम से साक्षरता अभियान का जनपक्षीय परिप्रेक्ष्य विकसित हो गया था जिसे हरियाणा में एक हद तक आत्मसात् किया गया। यह परिप्रेक्ष्य लोगों को अपनी बदहाली के कारणों को समझने और संगठित होकर उन्हें दूर करने के प्रयासों में शामिल होने के लिए प्रेरित करता था। इन परियोजनाओं में 'जन भागीदारी' का पहलू मूल रूप से शामिल था और यही इन अभियानों की सफलता का मापदंड भी था। दूसरा पहलू यह था कि इसमें 'स्वयंसेवी कार्य' करने की प्रेरणा बद्धमूल थी और यह पार्टी की समझ का एक और महत्त्वपूर्ण आयाम था।
         
हरियाणा में 'पानीपत की चौथी लड़ाई' के नाम से पार्टी की देखरेख में चले साक्षरता अभियान की विशेष बात यह रही कि ग्रामीण क्षेत्रों में हमारी पहुंच बनी। पानीपत में ही अनेक गांवों में कला जत्थे पहुंचे, अक्षर सैनिकों के प्रशिक्षण हुए और समुदाय के सहयोग से कक्षाएं लगीं। अन्य ज़िलों से गए हुए पार्टी कार्यकर्ताओं ने कड़ी मेहनत की। अभियान में प्रशासन की हिस्सेदारी और सरकारी वित्तीय अनुदान उपलब्ध होने के चलते लोगों के बीच पहुंच बनाना अपेक्षाकृत आसान हो गया। पार्टी ने समय-समय पर इस अभियान की कार्यवाहियों की समीक्षा की, लोगों तक व्यापक पहुंच की संभावनाओं का ठीक-ठीक आकलन किया और साथ ही सरकारी परियोजनाओं की सीमाओं को भी समझा। यह समझ बनी कि अन्य ज़िलों में भी संभावनाओं के अनुसार पार्टी के साथी इन अभियानों में शामिल हों ताकि जनता के बीच साक्षरता, शिक्षा तथा अन्य सामाजिक मुद्दों पर विमर्श चलाया जा सके। सिरसा, हिसार, जींद, भिवानी, कैथल, रोहतक आदि ज़िलों में पार्टी के साथियों ने एक समय पर तो नेतृत्वकारी भूमिका निभाई लेकिन कुछ समय पश्चात् कुछ ज़िलों में या तो प्रशासन के साथ विवाद उत्पन्न हो गए या फिर पार्टी के साथियों के बीच मतभेद उभरे। एक तीसरी स्थिति भी बनी जिसमें पार्टी के साथी ज़िला के साक्षरता अभियान में मुख्य भूमिका में नहीं थे। हिसार और एक हद तक जींद में तो पार्टी सदस्यों के बीच मतभेद बने, हालांकि जींद में पार्टी के एक हिस्से ने कार्य को संभालने की कोशिश की लेकिन हिसार में तो मतभेद इतने तीखे हुए की मुख्य साथियों में से एक को तो पार्टी से निष्कासित होना पड़ा और गैर पार्टी सदस्य को साक्षरता अभियान की मुख्य भूमिका में लाना पड़ा। भिवानी में प्रशासन के साथ विवाद के उभरने से पार्टी को अभियान से अलग होना पड़ा। 1991-95 के चार वर्षों में साक्षरता अभियान में किए गए कार्यों की समीक्षा तो हुई लेकिन यह समीक्षा भी मौखिक ही रही। कोई लिखित दस्तावेज़ तैयार नहीं हो सका। फिर भी समीक्षा के कुछ बिंदु जो आज भी हमारे विमर्श में बने रहते हैं, निम्नलिखित हैं :
          1.  हमारी पहुंच का दायरा बढ़ा और हम शहरी मध्यवर्ग से आगे बढ़कर ग्रामीण समुदायों में पहुंच बना सके।
          2.  इन समुदायों में से भी महिलाएं, दलित तबके और युवा ज़्यादा शामिल हुए और उनकी अपेक्षाएं और हिस्सेदारी एक सामाजिक प्रगतिशील प्रक्रिया के अंश रूप में होती हुई नज़र आई।
          3. हरियाणा के समाज में स्वयंसेवी भावना का प्रसार हुआ और जाति एवं पितृसत्ता जैसे अर्द्ध सामंती बंधनों में कुछ ढील आई।
       
प्रशासनिक हलकों में भी कुछ व्यक्ति इस कार्य को अपना निजी भावनात्मक समर्थन देते हुए दिखाई दिए। हमारी क्षमताओं में बढ़ोत्तरी हुई, जिसके चलते नवसाक्षरओं की पठन-पाठन सामग्री (कायदे एवं पुस्तकें), नाटक, गीत, रागनी आदि लिखे गए और गांव में भी पढ़ने-लिखने का वातावरण बना।

कहीं-कहीं तो जन-भागीदारी और रचनात्मक कार्यों का प्रभाव इतना सघन था कि ग्रामीण समाज में जनजागृति का वातावरण बनता हुआ दिखाई पड़ता था।

इन पहलुओं के साथ-साथ हमारी कमज़ोरियां भी अनेक थीं। जैसे - कुछ ज़िलों में पार्टी सदस्यों के बीच मतभेद उभरना, विज्ञान मंच के परिप्रेक्ष्य का समेकन न हो पाना (हालांकि साक्षरता अभियान के दौरान कहीं-कहीं विज्ञान प्रसार की गतिविधियां होती थीं)।
         
साधनों की उपलब्धता ने व्यक्तियों के बीच गहरी समझ और तालमेल को रिप्लेस कर दिया क्योंकि साधनों की मदद से लोगों में पहुंचने का कार्य आसान हो गया और आपसी सहयोग से योजनाएं बनाना, क्रियान्वित करना, अनुभवों को सहेजना, समीक्षाएं करना आदि महत्त्वपूर्ण कार्य छूटते गए। इन्हीं कारणों से परियोजनाओं के बाद की स्थिति पर भी स्पष्ट सांझी समझ नहीं बन पाई और अभियानों के बाद सांगठनिक कंसोलिडेशन कम हो पाया। विज्ञान मंच में भी जब परियोजनाओं का दौर शुरू हुआ था तब शुरुआत के समय में तो वैचारिक विमर्श था लेकिन बाद में मात्र ढांचा ही रह गया। इसी तरह साक्षरता अभियान में भी हुआ। इस दौरान सामाजिक हस्तक्षेप की पार्टी की नज़र का भी विखंडन होने लगा। बौद्धिक कार्य और सांगठनिक कार्य के बीच एक रेखा उभरने लगी जिसके चलते फ़ील्ड बनाम विचारधारात्मक कार्य की बाइनरी बनती चली गई। शीर्ष के नेतृत्वकारी साथियों के बीच वैचारिक मतभेद बने जो उनके आपसी संबंधों को भी प्रभावित करने लगे। इस समय तक भी पार्टी ने परियोजनाओं के प्रभावों को गंभीरता से विश्लेषित करके कोई प्रपत्र आदि तैयार नहीं किया था, हालांकि इस बात को रेखांकित किया जाने लगा था कि हमें परियोजनाओं में निहित खतरों और इनसे बनने वाले रुझानों के प्रति अधिक सचेत होकर कार्य करने की ज़रूरत है। विज्ञान मंच की परियोजनाओं और साक्षरता अभियानों की परियोजनाओं के लक्ष्य-उद्देश्यों तथा कार्य-नीति में कुछ अंतर ज़रूर थे, फिर भी सरकारी अनुदान का तत्त्व समान था जो गुणात्मक रूप से प्रभावित कर रहा था।
         
1995 तक राष्ट्रीय साक्षरता मिशन में भी मिशनरी प्रेरणा का ह्रास हो चुका था और राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी द्वारा निर्मित भारत ज्ञान-विज्ञान समिति के पास भी साक्षरता अभियानों को कंसोलिडेट करने के लिए ज़रूरी अंतर्दृष्टि का अभाव बनने लगा। ऐसी परिस्थितियों में देश के लगभग 350 ज़िलों में जो पहुंच बनी थी, उनमें से आधे से भी कम ज़िलों में हमारी कोशिशें और गतिविधियां जारी रह पाईं। हरियाणा में भी कमोबेश यही स्थिति बनी। उदाहरण के लिए पानीपत ज़िले के अभियान के उपरांत हम केवल समालखा खंड के कुछ गांवों में ही सक्रिय रह पाए। परियोजनाओं में भागीदारी खत्म होना और आगे की स्पष्ट योजनाओं के अभाव के चलते एक बार फिर इस क्षेत्र में शिथिलता आने लगी।  राष्ट्रीय स्तर पर भी दृष्टि धूमिल हुई लेकिन वहां के स्तर पर फिर भी राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के साथ तालमेल बना रहा जिसके चलते एक और अवसर मिला। अब की बार प्रौढ़ शिक्षा के लिए शैक्षणिक और रणनीतिक कामों को करने के लिए राज्य संसाधन केंद्रों की स्थापना और संचालन का कार्य प्राप्त हुआ। राष्ट्रीय स्तर पर भारत ज्ञान-विज्ञान समिति के अनुभव और साख के चलते 5 राज्यों में संसाधन केंद्र चलाने का कार्य मिला - हरियाणा, मध्य प्रदेश, असम, त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश। हरियाणा में पार्टी के स्तर पर एक बार फिर से मंथन शुरू हुआ कि यह केंद्र ले लिया जाए और इसे चलाने के लिए हमारी समझ क्या होनी चाहिए। अब तक हमने परियोजनाओं के अनुभवों को भले ही गहनता के साथ आत्मसात् करके सामूहिक समझ विकसित नहीं की थी परंतु फिर भी यह ज़रूर था कि परियोजनाओं की सीमाओं पर चर्चाएं हो रही थीं जिनका नतीजा यह था कि हमें परियोजना में काम तो करना चाहिए लेकिन समय-समय पर उसकी समीक्षा ज़रूरी है। दूसरी बात जो धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगी थी वह यह थी कि परियोजनाओं की सीमाओं में ही रह कर कोई बड़ा समाज-सुधार आंदोलन तो विकसित नहीं किया जा सकता। साक्षरता अभियान में युवा, दलित और महिलाओं की भागीदारी ने एक आंदोलन की संभावनाएं ज़रूर प्रस्तुत कर दी थी। इन संभावनाओं को देखते हुए और परियोजनाओं की सीमाओं को समझते हुए यह विमर्श शुरू कर लिया गया था कि हमें परियोजनाओं में कार्य करने के साथ-साथ एक स्वतंत्र संगठन बनाने की दिशा में बढ़ना चाहिए। परियोजनाओं में कार्य करने के अब तक अनुभवों की एक झलक पहले प्रस्तुत की गई है। फिर भी सैद्धांतिक समझ यही जारी रही कि दोनों कार्यों को साथ-साथ चला जाना चाहिए। राज्य संसाधन केंद्र का संचालन हमने 1995 से लेकर 2015 (लगभग 20 वर्षों) तक किया। पहले की परियोजनाओं का अनुभव तो हमारे पास था परंतु इस केंद्र का संचालन संस्थान के रूप में किया जाना था जो पहली बार का ही अनुभव बना। राष्ट्रीय केंद्र ने यह संस्थान हमारे आंदोलन को दिलवाने में तो मदद ज़रूर की लेकिन आगे के कार्यों के लिए वहां से भी दिशा-निर्देशन नहीं हो पाया। हमने यहां अब तक के अनुभवों से जो समझ विकसित की थी, उसके अनुसार कार्य शुरू किया। शुरुआत के समय में ही केंद्र के परिप्रेक्ष्य को लेकर सभी लोगों की राय अलग-अलग थी। पार्टी से बाहर के साथी भी हमारे केंद्र का अहम हिस्सा थे और पार्टी के भीतर के साथियों ने भी मत-भिन्नता थी, फिर भी कार्य हुआ। प्रथम चरण में यह स्पष्ट हुआ कि हमें केंद्र के कार्यों को आंदोलन के साथ न केवल तालमेल के साथ करना चाहिए बल्कि हमें इन तमाम कार्यों को आंदोलन को मज़बूत बनाने की दृष्टि से करना चाहिए। यह दृष्टि मूलतः सही थी परंतु व्यवहार में कुछ अंतर्विरोध भी बन रहे थे जिन्हें पार्टी की कमेटियों में चर्चा करके सुलझाने का कार्य नहीं हो पाया। इसके चलते मतभिन्नताएं, मतभेदों और फिर मनभेदों में बदल गईं। इन परिस्थितियों में जो भी थोड़े-बहुत जनोन्मुखी प्रयोग तथा जन आंदोलन के समरूप कार्य हो भी पाए तो उसके सकारात्मक प्रभाव अपेक्षाकृत कम होते गए और निरुत्साहित करने वाला वातावरण बनता गया। इसके ही फलस्वरूप सामूहिक विवेक के साथ स्वतंत्र संगठन खड़ा करने का कार्य भी ठीक से नहीं हो पाया और केंद्र के संसाधनों का उपयोग भी बेहतर नहीं हो पाया। हालांकि केंद्र के साधनों के ज़रिये ही नाटक और पुस्तकों के क्षेत्र में जनपक्षीय कार्य हुआ। एक पत्रिका भी लगातार प्रकाशित हुई और समाज के शिक्षित मध्य वर्गीय हिस्से में भी हमारी पहुंच बढ़ी। इसके बावजूद आपसी मतभेदों का दुष्प्रभाव पड़ा जिसके चलते स्वतंत्र संगठन बनाने का कार्य भी अवरुद्ध हुआ और साथ ही इन संस्थानों को भी हम आंदोलन का हिस्सा नहीं बना पाए।
     इस दौर में परियोजना बनाम संगठन की बहस छिड़ गई जिसमें द्वंद्वात्मक दृष्टि का अभाव रहा और व्यक्तिगत कार्यों का महिमामंडन होने लगा। आरोप-प्रत्यारोप बने, कुछ पार्टी सदस्यों ने दूसरों को अवरोध के तौर